Sunday, January 11, 2026

प्रसंगवश - कर्म (KARMA) - वेदांत और गीता का सार

प्रसंगवश - 

कर्म (KARMA) - वेदांत और गीता का सार 

******* 









प्रतीकात्मक चित्र साभार NightCafe 

अध्यात्म में जब हम अध्ययन करते है तो पाते हैं कि गीता और वेदांत के अनुसार, कर्मों का वर्गीकरण अलग-अलग आधारों पर किया गया है। वेदांत के अनुसार तीन तरह के कर्म बताए जाते हैं - क्रियमाण कर्म, संचित कर्म और प्रारब्ध कर्म।  


* संचित कर्म (Sanchita Karma) - यह हमारे अनंत जन्मों के कर्मों का वह विशाल भंडार है जो अभी "गोदाम" में जमा है। यह उस तर्कश (Quiver) की तरह है जिसमें बहुत सारे बाण रखे हैं।


 * प्रारब्ध कर्म (Prarabdha Karma) - संचित कर्मों का वह हिस्सा जो इस वर्तमान जीवन में फल देने के लिए "पक" चुका है। यह वह बाण है जो धनुष से छूट चुका है; इसे अब वापस नहीं लिया जा सकता, इसका फल भोगना ही पड़ता है। साधना और ईश्वर कृपा से प्रारब्ध के प्रभाव को सहने की शक्ति मिलती है, भले ही घटना अपरिवर्तनीय हो। 


 * क्रियमाण कर्म (Kriyaman Karma) - यह वह कर्म है जो हम अभी वर्तमान में कर रहे हैं। यह वह बाण है जिसे हमने अभी धनुष पर चढ़ाया है। हमारे पास इसे चलाने की दिशा बदलने की स्वतंत्रता (Free will) है। यही कर्म भविष्य में 'संचित' बन जाते हैं।


कर्म के बारे में सकाम और निष्काम कर्म की बात की जाती है। भगवान कृष्ण ने गीता (अध्याय 4, श्लोक 17) में कर्म की गति को समझाने के लिए तीन तरह के कर्म का ज्ञान दिया। 


 * कर्म (Karma) - शास्त्र सम्मत और उचित कार्य। 


 * विकर्म (Vikarma) - निषिद्ध या गलत कार्य (जो नहीं करने चाहिए)।


 * अकर्म (Akarma) - फल की इच्छा के बिना किया गया कर्म (निष्काम भाव से किया कर्म), जो मनुष्य को कर्मों के बंधन से मुक्त कर देता है।


संक्षेप में, सकाम और निष्काम, यह कर्म करने की नियत (Intention) बताते हैं। संचित, प्रारब्ध और क्रियमाण: यह कर्मों के समय और प्रभाव (Accumulation and Effect) को दर्शाते हैं। 


गीता में कर्मों का वर्गीकरण मुख्य रूप से दो आधारों पर किया गया है - एक जो कर्मों की प्रकृति (Nature) बताते हैं और दूसरे जो कर्म करने वाले के गुण (Gunas) पर आधारित हैं।

 

1. कर्म, विकर्म और अकर्म (गीता अध्याय 4)

भगवान कृष्ण ने अध्याय 4 के श्लोक 17 और 18 में कर्म की सूक्ष्म गति को समझाया है। यह वर्गीकरण सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है - 


कर्मणो ह्यपि बोद्धव्यं बोद्धव्यं च विकर्मणः।

अकर्मणश्च बोद्धव्यं गहना कर्मणो गतिः॥ (4.17)


भावार्थ - कर्म का स्वरूप भी समझना चाहिए, 'विकर्म' (गलत कर्म) का स्वरूप भी समझना चाहिए और 'अकर्म' का स्वरूप भी समझना चाहिए; क्योंकि कर्म की गति बहुत गहन (रहस्यमयी) है।


 * कर्म - शास्त्र सम्मत या कर्तव्य कर्म।


 * विकर्म - जो कर्म शास्त्र के विरुद्ध हों या पाप कर्म हों।


 * अकर्म - फल की इच्छा के बिना किया गया कर्म, जो मनुष्य को बंधन में नहीं डालता।


2. सकाम और निष्काम कर्म (अध्याय 2)


गीता अध्याय 2 का श्लोक 47 निष्काम कर्म का आधार है - 


कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।

मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि॥ (2.47)


भावार्थ - तेरा अधिकार केवल कर्म करने में है, उसके फलों में कभी नहीं। इसलिए तू कर्मों के फल का हेतु मत बन और तेरी आसक्ति कर्म न करने (अकर्मण्यता) में भी न हो। 


यहाँ यह स्पष्ट करना जरूरी है कि 'अकर्म' (निष्काम कर्म) और अकर्मण्यता (काम न करना या आलस्य) दो अलग चीजें हैं। अक्सर लोग अकर्म का अर्थ 'कुछ न करना' समझ लेते हैं, जो गलत है। 


3. गुणों के आधार पर कर्म (गीता अध्याय 18)


गीता अध्याय 18 में भगवान श्रीकृष्ण ने सत्त्व, रज और तम गुणों के आधार पर कर्म के तीन प्रकार बताए हैं - 


 * सात्त्विक कर्म (18.23) - जो कर्म नियत है, आसक्ति रहित है और राग-द्वेष के बिना, फल की इच्छा न रखने वाले व्यक्ति द्वारा किया गया है। 


 * राजस कर्म (18.24) - जो कर्म बहुत परिश्रम के साथ, फल की इच्छा रखने वाले या अहंकार से युक्त पुरुष द्वारा किया जाता है।


 * तामस कर्म (18.25) - जो कर्म परिणाम, हानि, हिंसा और अपनी सामर्थ्य का विचार किए बिना केवल मोहवश किया जाता है। 


निष्कर्ष (Conclusion) 


उपरोक्त विवेचन से यह स्पष्ट है कि हमारा भूतकाल 'प्रारब्ध' के रूप में सामने खड़ा है, जिसे धैर्य और साधना से स्वीकार करना चाहिए। लेकिन हमारा भविष्य पूरी तरह हमारे वर्तमान यानी 'क्रियमाण कर्म' पर निर्भर है। यदि हम अपने कर्मों को 'अकर्म' (निष्काम भाव) और 'सात्त्विक' गुणों से जोड़ लें, तो न केवल हम सुखी जीवन जी सकते हैं, बल्कि जन्म-मरण के इस कर्म-चक्र से मुक्त भी हो सकते हैं। अतः हाथ में लिए बाण (वर्तमान कर्म) को सही दिशा देना ही मनुष्य का वास्तविक पुरुषार्थ है।


संचित - आपका बैंक बैलेंस (पुराना जमा)।


प्रारब्ध - वर्तमान में मिलने वाली किश्त (EMI)।


क्रियमाण - वह नया निवेश जो आप आज कर रहे हैं।

 

सादर, 

केशव राम सिंघल 



Sunday, December 21, 2025

ॐ की महत्ता

ॐ की महत्ता 
********  













प्रतीकात्मक चित्र साभार NightCafe 


ॐ का बहुत महत्त्व है। अथर्ववेद के उपनिषद माण्डूक्योपनिषद में ॐ को ब्रह्म और चेतना का रूप माना गया है। ॐ को ओउम् या ओंकार भी कहा जाता है। सनातन धर्म में ॐ एक पवित्र ध्वनि और आध्यात्मिक प्रतीक है। ॐ की ध्वनि एक शक्तिशाली कम्पन पैदा करती है, जिसका उपयोग हम अपने मन को केंद्रित करने और ध्यान की स्थिति में पहुँचने के लिए कर सकते हैं। इसकी ध्वनि हमारे मन और शरीर पर सकारात्मक और शांत प्रभाव पैदा करती है। ॐ की महिमा अपार है। ॐ की ध्वनि का निर्माण 'अ', 'उ' और 'म्' इन तीन अक्षरों से हुआ है। माण्डूक्योपनिषद के अनुसार सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड अ + उ + म् + मौन के चार कारक सिद्धांतों पर है। 'अ' अर्थात यह भूलोक और स्थूल दृश्य जगत। ॐ का 'अ' शुरुआत या सृजन का आधार है। 'उ' अर्थात सूक्ष्म जगत, यही ब्रह्माण्ड के संरक्षण का आधार है। 'म्' अर्थात सुपुप्ति से सम्बन्ध रखने वाले अदृश्य, अगोचर अथवा जाग्रत अवस्था में जिसका ज्ञान बुद्धि से नहीं हो सकता और जहाँ बुद्धि की पहुँच नहीं है और जो मन, बुद्धि और वाणी से परे है। 'म्' ही ब्रह्माण्ड के अंत का प्रतीक भी है। एक ॐ और दूसरे ॐ की ध्वनि के बीच जो विश्राम है, वही मौन है। मौन जो मन को केंद्रित करता है। यही अनंत विराम है, कोई अक्षर नहीं, कोई ध्वनि नहीं। इसी में सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड समाया हुआ है। हम कह सकते हैं कि ॐ सर्व का ही प्रतिरूप है। ॐ ही प्राण, बुद्धि और विवेक का आधार स्तम्भ है। आदि से अंत तक सभी कुछ ॐ के अंतर्गत हैं।  

बाइबिल में कहा गया है की सृष्टि की आदि में शब्द था, यह शब्द ब्रह्म के साथ ही था और यह शब्द ही ब्रह्म भी था। (In the beginning there was a word, the word was with God and the word was God.) अपनी प्रार्थना के अंत में ईसाई 'अमेन' (Amen) शब्द का प्रयोग करते हैं।  मुसलमान अपनी प्रार्थना (नमाज) में 'आमीन' (Aameen) कहा करते हैं।  ये 'अमेन' और 'आमीन' भी ॐ के रूपांतर मात्र हैं। "सार-संक्षेप - ॐ रहस्य" पर पिछला लेख क्लिक कर पढ़ सकते हैं।  

सादर,
केशव राम सिंघल 


Monday, December 1, 2025

गायत्री मंत्र - अर्थ, महत्त्व और जीवन संदेश

गायत्री मंत्र - अर्थ, महत्त्व और जीवन संदेश









चित्र साभार NightCafe 

गायत्री मंत्र वेदों का महामंत्र है—प्रकाश, ज्ञान और सद्बुद्धि की ओर ले जाने वाला पथदर्शक। यह मंत्र न केवल आध्यात्मिक उन्नति का साधन है, बल्कि जीवन के हर क्षेत्र में सकारात्मकता, स्पष्टता और संतुलन प्रदान करता है।


गायत्री मंत्र 


ॐ भूर्भुवः स्वः

तत्सवितुर्वरेण्यं

भर्गो देवस्य धीमहि

धियो यो नः प्रचोदयात्।


Om Bhur Buvah Swah

Tatsavitur Varenyam

Bhargo Devasya Dheemahi

Dhiyo Yo Nah Prachodayat. 


भावार्थ 


हम उस परमात्मा का ध्यान करें—जो प्राणस्वरूप है, दुःखों का नाश करने वाला है, सुख और शांति का दाता है, श्रेष्ठ और तेजस्वी है, तथा पापों को नष्ट करने वाला है। हे प्रभु! आप हमारी बुद्धि को सन्मार्ग की ओर प्रेरित करें और हमारे अंतःकरण को प्रकाशमान करें।


मंत्र के पदों का सरल जीवनोपयोगी अर्थ 


ॐ (अ + उ + म्) –

अ = आत्मानंद में रमण करना

 उ = उन्नति की ओर बढ़ना

 म् = महानता की ओर अग्रसर होना

  अर्थात्: आत्मानंद से प्रेरित होकर उन्नति और महानता की ओर बढ़ते रहना।


भूः – हम शरीर नहीं, आत्मा हैं—प्राण हैं।


भुवः – अपने कर्मों और कर्तव्यों को सद्कर्मों से पूरा करना।


स्वः – मन को भीतर स्थिर कर आत्म-नियंत्रण विकसित करना।


तत् – जीवन और मृत्यु की अनिवार्यता को समझना; वास्तविकता को स्वीकारना।


सवितुः – सूर्य के समान तेजस्वी, उज्ज्वल और ऊर्जावान बनना।


वरेण्यं – अशुभ चिंतन को त्यागकर श्रेष्ठ चिंतन को अपनाना।


भर्गः – पापों से बचते हुए निष्पाप जीवन की ओर अग्रसर होना।


देवस्य – अशुद्ध दृष्टिकोण से बचकर शुद्ध, दिव्य विचारों को अपनाना।


धीमहि – सद्गुणों को अपने भीतर धारण करना।


धियो – विवेक का महत्त्व समझकर विवेकवान बनना।


यो नः – आत्मसंयम और परमार्थ के दिव्य मार्ग को अपनाना।


प्रचोदयात् – हे भगवान! हमारी बुद्धि को सद्मार्ग पर प्रेरित करें।


गायत्री मंत्र केवल जप नहीं—जीवन का मार्गदर्शन है। यह सिखाता है कि मन शुद्ध हो, विचार श्रेष्ठ हों, कर्म नैतिक हों और जीवन प्रकाशमय। 


सादर, 

केशव राम सिंघल 

(संकलित) 



Wednesday, September 17, 2025

अध्यात्म और विज्ञान – चेतना का शाश्वत सत्य

अध्यात्म और विज्ञान – चेतना का शाश्वत सत्य

**************** 









प्रतीकात्मक चित्र साभार NightCafe 

अध्यात्म कहता है – आत्मा न तो जन्म लेता है और न ही कभी मरता है। आत्मा शाश्वत, अविनाशी और सनातन है। (गीता, अध्याय 2 – श्लोक 19, 20)


विज्ञान भी यही कहता है – ऊर्जा कभी समाप्त नहीं होती, वह केवल अपना रूप बदलती है।


स्पष्ट है कि अध्यात्म और विज्ञान दोनों ही एक ही सत्य की ओर संकेत करते हैं। आत्मा कहें या ऊर्जा – यही तो चेतना है। यही हमारे अस्तित्व का मूल स्वरूप है।


आप अकेले नहीं हैं, मैं अकेला नहीं हूँ। हम सब इस अनंत यात्रा का हिस्सा हैं। हम केवल रूप बदलते रहते हैं, जैसे एक लहर समुद्र से कभी अलग नहीं होती, केवल अपना आकार बदलकर आगे बढ़ती रहती है।


जब आप और मैं इस भौतिक दुनिया से विदा होंगे, तब भी हम पूरी तरह समाप्त नहीं होंगे। केवल शरीर निष्क्रिय होगा, परंतु हमारे शब्द, हमारे कर्म, हमारे विचार और यहाँ तक कि हमारी आनुवंशिक जानकारी (डीएनए) – हमारी संतान, समाज और आने वाले कल में जीवित रहेंगे।


हम सब शाश्वत चेतना से निरंतर जीवित रहते हैं। हम अपने पूर्वजों का विस्तार हैं और अपनी संतान के भविष्य के बीज हैं।


ब्रह्माण्ड के लिए हम कभी समाप्त नहीं होते। हम केवल एक यात्रा पर हैं – जहाँ शरीर बदलते हैं, रिश्ते बदलते हैं, पर हमारी असली पहचान – हमारी चेतना – शाश्वत बनी रहती है।


यही विज्ञान का अद्भुत चमत्कार है और यही अध्यात्म का सनातन सत्य है।


सादर,

केशव राम सिंघल 

#अध्यात्म #विज्ञान #चेतना #आत्मा #ऊर्जा #सनातनसत्य #गीता 


Saturday, August 2, 2025

अंतः अस्ति आरम्भः

अंतः अस्ति आरम्भः

******* 










कुछ दिन पूर्व मैंने एक व्यक्ति की भुजा पर अंकित एक अद्भुत वाक्य देखा— “अंतः अस्ति आरम्भः”। यह छोटा-सा कथन अपने भीतर गहरी दार्शनिक गूँज समेटे हुए है—अर्थात, अंत ही शुरुआत है।


हर अंत किसी नए आरंभ का कारण बनता है। जैसे रात का अंत सुबह के आगमन का संदेश है, वैसे ही मृत्यु के पश्चात जन्म—जीवन-चक्र की नई यात्रा का आरंभ है। प्रकृति और जीवन में निरंतर परिवर्तन, नवीनीकरण और पुनः आरंभ ही शाश्वत नियम हैं। कुछ भी स्थायी नहीं; हर अंत में ही नई संभावना, नई ऊर्जा, और नए क्षितिज छिपे होते हैं।


मानसिक, भावनात्मक या भौतिक स्तर पर जो समाप्त होता है, उसी की खाली जगह में कोई नई शुरुआत जन्म लेती है। इसलिए अंत को केवल हानि, दुःख या विदाई के रूप में नहीं देखना चाहिए, बल्कि इसे नए मार्ग, अवसर और विकास के द्वार के रूप में स्वीकार करना चाहिए।


व्यक्तिगत जीवन में जब नौकरी, संबंध या जीवन का कोई चरण समाप्त होता है, तो प्रायः हम दुख, डर या खालीपन से घिर जाते हैं। परंतु, यही समाप्ति नए लक्ष्य, नई मित्रता, नया व्यवसाय, नई नौकरी या नई पहचान की नींव रख सकती है। हर बदलाव हमें जीवन में कुछ नया देखने, सीखने और बढ़ने का अवसर देता है।


प्रकृति में भी यही क्रम चलता है। पतझड़ में जब वृक्ष अपनी पत्तियाँ खो देता है, तो लगता है मानो उसकी संपन्नता समाप्त हो गई हो। किंतु यही पतझड़ नई बहार, नई कोपल और नए जीवन का संकेत बनकर आता है। सूर्यास्त के बाद अंधकार छा जाता है, किंतु उसी अंधकार की गोद में अगली सुबह के रंग पलते हैं।


आध्यात्मिक दृष्टि से मृत्यु को अंत नहीं, बल्कि आत्मा की नई यात्रा का प्रारंभ माना गया है। यहीं से या तो पुनर्जन्म का मार्ग खुलता है या मोक्ष का द्वार। इस प्रकार, “अंत” केवल परिवर्तन है—रूप का परिवर्तन, अवस्था का परिवर्तन।


अतः “अंतः अस्ति आरम्भः" केवल एक वाक्य नहीं, बल्कि जीवन का गूढ़ सत्य और दार्शनिक सारांश है— हर अंत में एक नई शुरुआत छुपी होती है।


सादर, 

केशव राम सिंघल 

Sunday, July 13, 2025

पौराणिक कथा - भगवान् भोलेनाथ ने किया बधिक का कल्याण

पौराणिक कथा

भगवान् भोलेनाथ ने किया बधिक का कल्याण 
**********  















प्रतीकात्मक चित्र साभार NightCafe 

भगवान् भोलेनाथ (शिवजी) कल्याण के परमदाता हैं। वे अपने भक्तों की भावनाओं को तुरंत समझते हैं और उन्हें त्वरित फल प्रदान करते हैं।

बहुत प्राचीन समय की बात है। एक बधिक (शिकार करने वाला) प्रतिदिन की भाँति वन में शिकार हेतु गया। दुर्भाग्यवश, उस दिन उसे कोई शिकार नहीं मिला। भूख और थकान से व्याकुल वह बधिक निराश होकर वन में भटक रहा था। तभी उसकी दृष्टि एक प्राचीन शिव मंदिर पर पड़ी।

संयोग से उस दिन महाशिवरात्रि थी। कुछ पाने की आशा में वह मंदिर के भीतर प्रवेश कर गया। उसने देखा कि शिवलिंग के ऊपर सोने का एक सुंदर छत्र लटका हुआ है। वह लोभ में आ गया और उस छत्र को उतारने के लिए सीधा शिवलिंग पर चढ़ गया।

परन्तु भगवान् शिव, जो भोलेनाथ हैं, उन्होंने उस घटना को कुछ और ही रूप में ग्रहण किया। उन्होंने समझा कि वह व्यक्ति स्वयं को भगवान को समर्पित कर रहा है — पूर्ण आत्मसमर्पण। इस निष्कलंक भावना को देखकर शिवजी उसी क्षण प्रकट हुए और बधिक को दर्शन देकर उसे वरदान प्रदान किया।

सीख

भगवान् भोलेनाथ अत्यंत सरल, दयालु और उदार हृदय हैं। वे भाव के भूखे हैं, औपचारिकता के नहीं। यदि हम सच्चे मन से उनका स्मरण और आराधना करें, तो वे अवश्य ही कृपा करते हैं।

सादर,
केशव राम सिंघल 


Thursday, July 10, 2025

पौराणिक कथा पुनर्लेखन - ब्राह्मण का अभिमान और मोक्ष का मार्ग

पौराणिक कथा पुनर्लेखन

ब्राह्मण का अभिमान और मोक्ष का मार्ग

********** 









प्रतीकात्मक चित्र साभार NightCafe 

प्राचीन समय की बात है। एक ब्राह्मण तप और मोक्ष की लालसा में अपने वृद्ध माता-पिता को अकेला छोड़कर वन चला गया। वहाँ वह एक वृक्ष के नीचे बैठकर कठोर तपस्या करने लगा। कई दिन बीत गए। एक दिन उसी वृक्ष पर बैठा एक पक्षी, अनजाने में ब्राह्मण के ऊपर बीट कर गया। ब्राह्मण को बहुत क्रोध आया। उसने गुस्से से पक्षी की ओर देखा — उसी क्षण वह पक्षी जलकर भूमि पर गिर पड़ा।


यह देखकर ब्राह्मण को अपनी शक्ति पर अभिमान हो गया — "मेरे तप में इतनी शक्ति है!"


कुछ दिन बाद वह एक गाँव में भिक्षा माँगने पहुँचा। अपने से बड़ों की सेवा-सुश्रुवा में व्यस्त एक गृहिणी ने जब तुरंत भिक्षा नहीं दी, तो ब्राह्मण ने उसी क्रोध से उसे देखने का प्रयास किया। परंतु गृहिणी ने शांत स्वर में कहा, "महाराज, मैं वह पक्षी नहीं हूँ जो आपके क्रोध से भस्म हो जाऊँ।"


यह सुनकर ब्राह्मण चौंका और बोला, "हे देवी! आपको यह बात कैसे ज्ञात हुई?"


गृहिणी ने उत्तर दिया, "महाराज, कृपया भिक्षा ग्रहण करें। मेरे पास विवाद का समय नहीं है। यदि आप जानना चाहें, तो गाँव के बाहर रहने वाले चाण्डाल के पास जाइए।"


आश्चर्यचकित ब्राह्मण वहाँ पहुँचा। चाण्डाल ने उसका आदर किया और कहा, "मुझे मालूम है कि आपको यहाँ क्यों भेजा गया है। परंतु मैं इस समय व्यस्त हूँ। आप तुलाधार नामक वैश्य के पास जाइए, वह आपको मार्ग बताएगा।"


ब्राह्मण तुलाधार वैश्य के पास पहुँचा। वह व्यापार में व्यस्त था, परंतु ब्राह्मण को देखकर मुस्कुराया और बोला, "आपको सत्य जानने की इच्छा है तो अद्रोहक ऋषि के पास जाइए। वही आपको सच्चा मार्ग बताएँगे।"


ब्राह्मण जब अद्रोहक ऋषि के पास पहुँचा, तो उन्होंने शांत भाव से कहा, "महाराज, आपका धर्म अपने वृद्ध माता-पिता की सेवा करना था। आपने उन्हें त्यागकर तपस्या की, पर यह मोक्ष का मार्ग नहीं है। तपस्या अहंकार के साथ नहीं की जाती।"


उन्होंने आगे कहा, "मन, वचन और कर्म से माता-पिता की सेवा ही आपके लिए सच्चा धर्म है। जब आप अपना कर्तव्य पूरी श्रद्धा से निभाएँगे, जब आप अपने अभिमान को त्यागेंगे, तब ही मोक्ष की दिशा खुलेगी। ईश्वर की सच्ची स्तुति वहीं होती है जहाँ धर्म का पालन हो।"


ब्राह्मण को आत्मबोध हुआ। उसने अपना अहंकार त्यागा और लौटकर अपने माता-पिता की सेवा में लग गया।


मेरी सीख


कर्तव्यपालन और विनम्रता ही मोक्ष का मार्ग है।


सादर,

केशव राम सिंघल