Saturday, April 8, 2017

#064 - गीता अध्ययन एक प्रयास


*#064 - गीता अध्ययन एक प्रयास*

*ॐ*

*जय श्रीकृष्ण*

*गीता अध्याय 6 - ध्यानयोग - श्लोक 19 से 25*


6/19
*यथा दीपो निवातस्थो नेङ्गते सोपमा स्मृता !*
*योगिनो यतचित्तस्थ युञ्जतो योगमात्मनः !!*


6/20
*यत्रोपरमते चित्तं निरुद्धं योगसेवया !*
*यत्र चैवात्मनात्मानं पश्यन्नात्मनि तुष्यति !!*


6/21
*सुखमात्यन्तिकं यत्तद्बुद्धिग्राह्यमतीन्द्रियम् !*
*वेत्ति यत्र न चैवायं स्थितश्चलति तत्त्वतः !!*


6/22
*यं लब्ध्वा चापरं लाभ मन्यते नाधिकं ततः !*
*यस्मिन्स्थितो न दुःखेन गुरुणापि विचाल्यते !!*


6/23
*तं विद्याददुःखसंयोगवियोगं योगसंज्ञीतम् !*
*सा निश्चयेन योक्तव्यो योगोअनिर्विण्णचेतसा !!*


6/24
*संकल्पप्रभवान्कामांस्त्यक्त्वा सर्वानशेषतः !*
*मनसैवेन्द्रियग्रामं विनियम्य समन्ततः !!*


6/25
*सनी शनैरुपरमेद्बुद्धया धृतिगृहीतया !*
*आत्मसंस्थंमनः कृत्वा न किंचिदपिचिन्तयेत् !!*


*भावार्थ*

(श्रीकृष्ण अर्जुन से)
जैसे उस स्थान में जहाँ वायु स्पंदनरहित हो दीपक की लौ हिलती-डुलती नहीं है, उसे प्रकार योग का अभ्यास करने वाले व्यक्ति (ध्यानयोगी) का अंतर्मन वश में रहता है और वह आध्यात्म में स्थिर रहता है. (6/19)

जिस अवस्था में योग का अभ्यास करने से चित्त निरुद्ध (एकाग्र) हो जाता है और जिस अवस्था में वह विशुद्ध मन से अपने आपको अनुभव करता हुआ अपने-आपमें संतुष्ट हो जाता है. (6/20)

जो परम सुख (शांति) दिव्य और बुद्धि से ग्रहणीय है, ऐसा अनुभव करता है और उस सुख में स्थिर रहता है (तल्लीन हो जाता है), वह व्यक्ति (ध्यानयोगी) सत्य से फिर विचलित नहीं होता. (6/21)

जिस लाभ के प्राप्त होने पर उससे अधिक कोई दूसरा लाभ नहीं मानता और परमात्मा में स्थिर रहने से वह बड़े दुःख से भी विचलित नहीं होता. (6/22)

जो दुखों के संयोग से रहित है, उसी को योग समझना चाहिए. न उकताए चित्त (धैर्य) से इस योग को निश्चित ही करना चाहिए. (6/23)

[व्यक्ति (योगी) को चाहिए कि] संकल्प से पैदा होने वाली सभी कामनाओं को सभी तरह से त्यागकर और अपने अंतर्मन से इंद्रियों (शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गंध) को सभी प्रकार से मुक्त कर धैर्य से बुद्धि को धीरे-धीरे वश में करते हुए अपने अंतर्मन को परमात्मा में स्थापित करें, कुछ अन्य चिंतन ना करें. (6/24, 25)

*प्रसंगवश*

मन वस्तुतः बहुत चंचल होता है, पर हमें यह सीखना चाहिए कि ध्यानयोग के अभ्यास के लिए अंतर्मन को वश में करने की जरूरत है. ध्यानयोग में योगी इन्द्रियाँ-विषयों से दूर रहकर अपने स्वरूप में मन लगाने से वह अपने अंतर्मन को परमात्मा के ध्यान में स्थापित कर लेता है.

सादर,

केशव राम सिंघल



Tuesday, April 4, 2017

#063 - गीता अध्ययन एक प्रयास


*#063 - गीता अध्ययन एक प्रयास*

*ॐ*

*जय श्रीकृष्ण*

*गीता अध्याय 6 - ध्यानयोग - श्लोक 16 से 18*


6/16
*नात्यश्नतस्तु योगोअस्ति न चैकान्तमनश्नतः !*
*न छाती स्वप्नशीलस्य जाग्रतो नैव चार्जुन !!*


6/17
*युक्ताहारविहारस्य युक्तचेष्टस्य कर्मसु !*
*युक्तस्वप्नावबोधस्य योगो भवति दुःखहा !!*


6/18
*यदा विनियतं चित्तमात्मन्येवावतिष्ठते !*
*निःस्पृहः सर्वकामेभ्यो युक्त इत्युच्यते तदा !!*


*भावार्थ*

(श्रीकृष्ण अर्जुन से)
हे अर्जुन ! योग न तो अधिक खाने वाले का, न बिलकुल नहीं खाने वाले का, न अधिक सोने वाले का और न बिलकुल नहीं सोनेवाले का सिद्ध (फलीभूत) होता है. (6/16)

दुःखों का नाश करने वाला योग यथायोग्य आहार और यथायोग्य विहार (घूमना-फिरना) करने वाले व्यक्ति का, कर्तव्य-कर्मों में संलग्न यथायोग्य चेष्टा करने वाले व्यक्ति का, यथायोग्य सोने और यथायोग्य जागने वाले व्यक्ति का सिद्ध (फलीभूत) होता है. (6/17)

वश में किया मन (चित्त) जिस समय अपने स्वरूप में स्थित रहता है और सम्पूर्ण पदार्थों से जब निःस्पृहः हो जाता है, उस समय वह व्यक्ति योगी है, ऐसा कहा जाता है. (6/18)

*प्रसंगवश*

जिस समय परमात्मा का ध्यान हो, उस समय कोइ भी सांसारिक वासना, आसक्ति, कामना, चाह, ममता, राग आदि नहीं होनी चाहिए. संयमित मन वाले व्यक्ति का सम्बन्ध संसार के मोह से नहीं बना रहता, बल्कि वह परमात्मा से अपना सम्बन्ध मानता है. संसार के त्याग अर्थात संसार से सम्बन्ध विच्छेद से शान्ति और परमात्मा की प्राप्ति से परमशान्ति (मोक्ष) मिलता है.

श्रीभगवान श्रीकृष्ण का यह सन्देश स्पष्ट है की योग का अभ्यास करने के लिए व्यक्ति को आवश्यक भोजन और निद्रा लेनी चाहिए.

निःस्पृहः होना = जब किसी पदार्थ और भोग की ज़रा भी इच्छा या परवाह नहीं हो.

चित्त की पांच अवस्थाएं होती हैं - मूढ़, क्षिप्त, विक्षिप्त, एकाग्र और निरुद्ध. 'मूढ़' और 'क्षिप्त' व्यक्ति योग करने योग्य नहीं होता है. 'विक्षिप्त' व्यक्ति, जिसका चित्त कभी स्वरूप में लगता है और कभी नहीं लगता है, वह योग का प्रयास कर सकता है. जब चित्त 'एकाग्र' हो जाता है, तब सविकल्प समाधि होती है. एकाग्र होने के बाद चित्त 'निरुद्ध' अवस्था को प्राप्त करता है और यही निर्विकल्प समाधि अर्थात योग होता है.

दो बातें महत्वपूर्ण हैं - पहली, चित्त स्वरूप में स्थित हो जाए और दूसरी, संपूर्ण पदार्थों से निःस्पृहः हो जाए. मन में किसी वस्तु, व्यक्ति, परिस्थिति, काल आदि का चिंतन न हो और कोई काम, वासना, आशा आदि न हो.

*जिज्ञासा*

*श्लोक 6/17 में 'यथायोग्य' से क्या तात्पर्य है ?*


यथायोग्य आहार = सत्य और न्यायपूर्वक अर्जित धन से प्राप्त भोजन, जो सात्त्विक, ववितर और शरीर के अनुकूल हो.

यथायोग्य विहार = ऐसा घूमना-फिरना जो स्वास्थ्य के लिए हितकर हो.

कर्तव्य कर्मों में यथायोग्य चेष्टा = देश, काल और परिस्थिति के अनुकूल शरीर निर्वाह के लिए कर्तव्य कर्म करना.

यथायोग्य सोना और जागना = इतनी ही निद्रा लेना, जो स्वास्थ्य के लिए हितकर हो, जिससे आलस्य न आए.

सादर,

केशव राम सिंघल



Sunday, February 26, 2017

#062 - गीता अध्ययन एक प्रयास


*#062 - गीता अध्ययन एक प्रयास*

*ॐ*

*जय श्रीकृष्ण*


*गीता अध्याय 6 - ध्यानयोग - श्लोक 11 से 15*

6/11
*शुचौ देशे प्रतिष्ठाप्य स्थिरमासनमात्मनः !*
*नात्युच्छ्रितं नातिनीचं चैलाजिनकुशोत्तरम !!*


6/12
*तत्रैकाग्रं मनः कृत्वा यतचित्तेन्द्रियक्रियः !*
*उपविश्यासने युञ्ज्याद्योगमात्मविशुद्धये !!*


6/13
*समंकायशिरोग्रीवं धारयन्नचलं स्थिरः !*
*सम्प्रेक्ष्य नासिकाग्रं स्वं दिशश्चानवलोकयन् !!*


6/14
*प्रशान्तात्मा विगतभीर्ब्रह्मचारिव्रते स्थितः !*
*मनः संयम्य मच्चित्तो युक्त आसीत् मत्परः !!*


6/15
*युञ्जन्नेवं सदात्मानं योगी नियतमानसः !*
*शान्तिं निर्वाणपरमां मत्संस्थामधिगच्छति !!*


*भावार्थ*

(श्रीकृष्ण अर्जुन से)
साफ़ जगह पर जहां कुश, मृगछाला और कपड़ा (वस्त्र) बिछा हो, जो न अत्यंत ऊंचा हो और न ही नीचा हो, ऐसे अपने आसान को स्थिर कर ! (6/11)

इस आसान पर बैठकर अंतःकरण (चित्त, मन) और इन्द्रियों की क्रियाओं को वश में रखकर अपने अन्तःकरण (मन) को एकाग्र कर अपने अंतःकरण (मन) की शुद्धि के लिए योग का अभ्यास कर ! (6/12)

अपने शरीर, सर और गले को सीधा स्थिर कर और इधर-उधर न देखकर अपनी नासिका के अग्रभाग को देखते हुए स्थिर होकर बैठ ! (6/13)

जिसका अंतःकरण (मन) शांत है, जो भय मुक्त है और जिसका जीवन संयत और नियत है (अर्थात जो शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गंध से दूर रहता हुआ मान, सम्मान और शरीर की आराम से दूर रहता हो), ऐसा सावधान व्यक्ति (जिसे हम ध्यानयोगी कह सकते हैं) अंतःकरण (मन) को संयम कर परमात्मा (श्रीभगवान, ब्रह्म) में अपने अंतःकरण (मन) को लगाकर परमात्मा (श्रीभगवान, ब्रह्म) के ध्यान में बैठ ! (6/14)

संयमित मन वाला व्यक्ति अपने अंतःकरण (मन) को इस तरह सदा श्रीभगवान के ध्यान में लगाता हुआ परमनिर्वाण (मोक्ष) स्थिति को प्राप्त करता है. (6/15)

सादर,

केशव राम सिंघल



#061 - गीता अध्ययन एक प्रयास


*#061 - गीता अध्ययन एक प्रयास*

*ॐ*

*जय श्रीकृष्ण !*

*गीता अध्याय 6 - ध्यान योग - श्लोक 7 से 10*


6/7
*जितात्मनः प्रशांतस्थ परमात्मा समाहितः !*
*शीतोष्णसुखादुःखेषु तथा मानापमानयोः !!*


6/8
*ज्ञानविज्ञानतृप्तात्मा कूटस्थो विजितेन्द्रियः !*
*युक्त इत्युच्यते योगी समलोष्टाश्मकाञ्चनः !!*


6/9
*सुहृन्मित्रार्युदासीन मध्यस्थद्वेष्यबन्धुषु !*
*साधुष्वपि च पापेषु समबुद्धिर्विशिष्यते !!*


6/10
*योगी युञ्जीत सततमात्मानं रहसि स्थितः !*
*एकाकी यतचित्तात्मा निराशीरपरिग्रहः !!*


*भावार्थ*

(श्रीकृष्ण अर्जुन से)
जिस व्यक्ति ने अपने आप पर विजय प्राप्त कर ली है (अर्थात् जिसने अपना अंतःकरण जीत लिया है), ऐसा व्यक्ति अनुकूल-प्रतिकूल, सुख-दुःख तथा मान-अपमान प्राप्त होने पर भी निर्विकार (शांत) रहता है, ऐसे व्यक्ति में परमात्मा(श्रीभगवान) सदैव समाहित रहते हैं अर्थात् परमात्मा (श्रीभगवान) उसे सदैव प्राप्त हैं. (6/7)

जिसका अंतःकरण कर्म करने की जानकारी (ज्ञान) और कर्मों की सिद्धि-असिद्धि में समभाव रखने (विज्ञान) से तृप्त है, जो निर्विकार है, जिसने अपनी इंद्रियों को जीत लिया है, जो कंकड़, पत्थर और स्वर्ण को एक समान देखता है, ऐसा व्यक्ति योग (समता) में संलग्न कहा जाता है. (6/8)

जो व्यक्ति हितैषी, मित्र, शत्रु, उदासीन, मध्यस्थ, ईर्षालु, सम्बंधी तथा साधु आचरण करने वाले और पाप आचरण करने वाले में समानभाव रखता है, वह व्यक्ति श्रेष्ठ है. (6/9)

भोग पदार्थों का त्याग कर, इच्छा-रहित होकर और अंतःकरण तथा शरीर को वश में रखकर व्यक्ति एकांत स्थान में अकेला रहकर अपने अंतःकरण को लगातार परमात्मा (श्रीभगवान) के ध्यान में लगाए. (6/10)

*प्रसंगवश*

यह संदेश स्पष्ट है कि हमें समान भाव रखने अर्थात् समबुद्धि का प्रयास करना चाहिए, क्योंकि समबुद्धिवाला व्यक्ति निर्लिप्त रहता है. निर्लिप्त रहने से योग होता है, लिप्तता होते ही 'भोग' की स्थिति आ जाती है.

*विचार करें*

*हम समता कैसे पाएँ ?*

बुराई रहित होना समता पाने का उपाय है. इसके लिए छः बातों का ध्यान रखें - किसी का बुरा ना मानें, किसी का बुरा ना करें, किसी का बुरा ना सोचें, किसी में बुराई ना देखें, किसी की बुराई ना सुने और किसी की बुराई ना कहें.

सादर,

केशव राम सिंघल




Friday, January 27, 2017

#060 - गीता अध्ययन एक प्रयास


*#060 - गीता अध्ययन एक प्रयास*

*ॐ*

*जय श्रीकृष्ण !*

*गीता अध्याय 6 - ध्यान योग - श्लोक 5 व 6*


6/5
*उद्धारेदात्मनात्मानं नात्मानमवसादयेत् !*
*आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः !!*


6/6
*बंधुरात्मात्मनस्तस्य येनात्मैवात्मना जित: !*
*अनात्मनस्तु शत्रुत्वे वर्तेतात्मैव शत्रुवत् !!*


*भावार्थ*

व्यक्ति स्वयं अपना उद्धार करे, अपना पतन न करे, क्योंकि आत्मा अपना ही मित्र है और आत्मा ही अपना शत्रु है. (6/5)

जिस व्यक्ति ने स्वयं अपने अंतःकरण को जीत लिया है, उसके लिए वह स्वयं ही अपना मित्र है और जिसने अपने अंतःकरण को नहीं जीता है, वह व्यक्ति स्वयं ही अपने से शत्रु की भांति व्यवहार करता है. (6/6)

*प्रसंगवश*

जिसने अपनी आत्मा को जीत लिया अर्थात् जिसका अंतःकरण (मन) काबू में है, उसके लिए उसकी आत्मा उसका मित्र है, किन्तु जो ऐसा नहीं कर पाया उसके लिए उसका अंतःकरण (मन) उसका शत्रु बना रहेगा.

*जिज्ञासा*

*हम अपना उद्धार कैसे करें ?*


शरीर, इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि, प्राणादि से अपने को ऊंचा उठाने का प्रयास करें. जड़ वस्तुओं से सम्बन्ध त्यागें. हमें यह समझ लेना चाहिए कि असत् के द्वारा सत् की प्राप्ति नहीं होती, वरन असत् के त्याग से सत् की प्राप्ति होती है. पदार्थ, क्रिया और संकल्पों में आसक्त ना हो. हममें ऐसी विचारशक्ति है, जिसको काम में लेने से हम अपना उद्धार कर सकते हैं. ज्ञानयोग, भक्तियोग या कर्मयोग (किसी भी एक साधन) द्वारा हम अपना उद्धार कर सकते हैं. अपने उद्धार और पतन में व्यक्ति स्वयं ही कारण होता है, दूसरा कोई नहीं.

*विचार करें*

क्या 'मैं' शरीर हूँ ? क्या शरीर मेरा है ? यदि शरीर मेरा है, तो यह मेरे साथ सदा क्यों नहीं रहता ?

'मैं' शरीर नहीं हूँ. 'मैं' अपरिवर्तनशील हूँ, जबकि 'शरीर' परिवर्तनशील है. 'मैं' कभी मरता नहीं. 'मैं' अविनाशी हूँ. यहाँ 'मैं' से तात्पर्य 'मेरे अंतःकरण' से है. इस 'मैं' में राग-द्वेष या लिप्तता का कोई भाव नहीं है.

जब 'मैं' प्रकृतिजन्य पदार्थों से अपना सम्बन्ध स्थापित करता है तो निर्लिप्तता का भाव समाप्त हो जाता है और अहंकार, राग-द्वेष आदि उत्पन्न हो जाते हैं. उस समय मेरा 'मैं' स्वयं का शत्रु हो जाता है.

सादर,

केशव राम सिंघल


Wednesday, January 25, 2017

#059 - गीता अध्ययन एक प्रयास


*#059 - गीता अध्ययन एक प्रयास*

*ॐ*

*जय श्रीकृष्ण*

*गीता अध्याय 6 - ध्यान योग - श्लोक 1 से 4*


6/1
*श्रीभगवानुवाच*
*अनाश्रितः कर्मफलं कार्यं कर्म करोति यः !*
*स संन्यासी च योगी च न निरग्निर्न चाक्रियः !!*


6/2
*यं संन्यासमिति प्राहुर्योगं तं विद्धि पांडव !*
*न हयसंन्यस्तसङ्कल्पो योगी भवति कश्चन !!*


6/3
*आरुरुक्षोर्मुनेर्योगं कर्म कारणमुच्यते !*
*योगारूढस्य तस्यैव शमः कारणमुच्यते !!*


6/4
*यदा हि नेन्द्रियार्थेषु न कर्मस्वनुषज्जते !*
*सर्वसङ्कल्पसंन्यासी योगारूढस्तदोच्यते !!*


*भावार्थ*

श्रीभगवान (श्रीकृष्ण) ने कहा -
जो व्यक्ति कर्मफल का आश्रय न लेकर (अर्थात् कर्मफल के प्रति अनासक्त रहकर) अपने कर्तव्य कर्म करता है, वही संन्यासी और योगी है और अग्नि का त्याग करने वाला संन्यासी नहीं होता और कर्मों का त्याग करने वाला योगी नहीं होता. (6/1)

हे अर्जुन ! जिसको लोग संन्यास कहते हैं, उसी को तुम योग समझो क्योंकि संकल्पों का त्याग किए बिना कोई भी व्यक्ति योगी नहीं हो सकता. (6/2)

जो व्यक्ति योग (समता) में संलग्न होना चाहता है, ऐसे मननशील व्यक्ति के लिए कर्तव्य कर्म करना एक साधन है और उस व्यक्ति के लिए यह (अर्थात् निष्काम भाव से दूसरों के हित में आसक्त का त्याग करते हुए विवेकपूर्वक कर्म करना) शान्ति प्राप्ति का साधन है. (6/3)

इसका कारण है कि जब व्यक्ति न तो इन्द्रियों के भोगों में और न ही कर्मों में आसक्त होता है, तब वह संपूर्ण संकल्पों का त्यागी व्यक्ति योगारूढ़ (योग में संलग्न) कहा जाता है. (6/4)

*प्रसंगवश*

श्रीकृष्ण भगवान का स्पष्ट संदेश है कि हमें कर्मफल के प्रति आसक्ति (राग) त्यागकर कर्तव्य कर्म करना चाहिए, जिससे दूसरों का हित होता हो.

संन्यास (सांख्ययोग) और योग (कर्मयोग) दोनों ही कल्याणकारी हैं, दोनों का फल भी एक ही है.

त्याग से शान्ति मिलती है.

कर्म करने के साथ कर्म का उद्देश्य महत्वपूर्ण है. आसक्ति रखने अथवा कामनापूर्ति के लिए कर्म करना और आसक्ति का त्याग करते हुए दूसरों के हित में कर्म करना , इन दोनों में बड़ा अंतर है. भोगी व्यक्ति अपने लिए कर्म करता है और कर्मयोगी दूसरों के लिए कर्म करता है.

*जिज्ञासा*

*संकल्पों का त्याग कैसे करें ?*


हमें मानव शरीर मिला है. यह अमूल्य है और इस जीवन में ही हमें अपना उद्धार करना है, ऐसा विचार करते हुए हमें निरर्थक संकल्पों से दूर रहना है. कर्मयोगी के रूप में दूसरों के हित में आसक्ति का त्याग करते हुए हमें कर्तव्य कर्म करना है. हमें यह विचार करना चाहिए और इस पर दृढ रहना चाहिए कि वास्तव में एक ही सता श्रीभगवान की है, संकल्पों या संसार की सत्ता नहीं है. अतः हमें संकल्पों से उदासीन रहना चाहिए, न ही राग करें और न ही द्वेष.

मन में जितनी भी बातें आती हैं, वे प्रायः भूतकाल या भविष्यकाल से सम्बंधित होती हैं अर्थात् जो गया या जो होने वाला है, पर यह सब अभी (वर्तमान में) नहीं है. जो अभी नहीं है, उसके चिंतन में समय बरबाद करने से बेहतर है कि हम श्रीभगवान के चिंतन में अपने समय को लगाएं. श्रीभगवान सर्वदा हैं और अभी भी हैं, ऐसा विचार कर निर्लिप्तभाव मन में लाएं.

सादर,

केशव राम सिंघल

Monday, January 23, 2017

#058 - गीता अध्ययन एक प्रयास


*#058 - गीता अध्ययन एक प्रयास*

*ॐ*

*जय श्रीकृष्ण*

*गीता अध्याय 5 से मेरी सीख*


मुक्ति (मोक्ष या कल्याण, जो भी कहें) के लिए संन्यास (कर्मों का परित्याग) और कर्मयोग दोनों ही कल्याणकारी हैं, पर संन्यास से कर्मयोग श्रेष्ठ है.

संन्यास = सांख्ययोग = कर्मों का परित्याग, पर कर्मों का स्वरूप से त्याग नहीं और ऐसी साधना जिसमें विवेक-विचार की प्रमुखता रहती है और एक मात्र दृष्टि परमात्म तत्त्व पर रहती है.

कर्मयोग के बिना संन्यास का साधन होना कठिन है.

कर्मयोगी सेवा करने के लिए सभी को अपना मानता है, पर अपने लिए किसी को भी अपना नहीं मानता.

कोई भी व्यक्ति संन्यास (सांख्ययोग) या कर्मयोग का पालन कर सकता है. सांख्ययोगी कर्तव्य का त्याग करके संसार से मुक्त होता है और कर्मयोगी कुछ पाने की इच्छा का त्याग करके मुक्त होता है. कर्मयोग में दूसरों की निष्काम भाव से सेवा करने से कामना-आसक्ति से सम्बन्ध विच्छेद होता है. संन्यास (सांख्ययोग) और कर्मयोग की साधन-प्रणाली भिन्न है, पर साध्य एक ही है.

संन्यास = सांख्ययोग = ज्ञानयोग

कर्मयोग और ज्ञानयोग दोनों का फल आत्मज्ञान अर्थात कल्याण अर्थात परमात्मा को प्राप्त करना है. हमें अपनी इन्द्रियाँ अपने वश में रखनी चाहिए, अपना अंतःकरण (मन) निर्मल रखना चाहिए. हमें अपने समस्त कर्मों को परमात्मा में अर्पण कर आसक्ति (राग, मोह) का त्याग कर कर्तव्य-कर्म सहित अपने सभी कर्म करने चाहिए, इस प्रकार हम ब्रह्म (परमात्मा) को प्राप्त कर सकेंगे.

हमें कर्म करना चाहिए और साथ ही कर्म करने का ज्ञान आना चाहिए. यदि हम कर्म करते हैं, पर कर्म करने की विद्या का हमें ज्ञान नहीं है अथवा कर्म करने की विद्या का ज्ञान तो है पर कर्म नहीं करते, तब दोनों ही स्थितियों में हमारे द्वारा सुचारुरूप से कर्म नहीं होते हैं. इसलिए कर्म करने के साथ कर्मों को जानना भी महत्वपूर्ण है.

परमात्मा का ध्यान करने से जब मन-बुद्धि में राग-द्वेष, कामना, विषमता का सर्वदा अभाव हो जाता है, तब अंतःकरण में स्वतः समता आ जाती है. सभी कुछ तो ब्रह्म (परमात्मा, भगवान) का है तो फिर किसी से कैसा द्वेष, राग या मोह ... यही भाव हमें समता की ओर ले जाता है.

इस संसार में जितनी भी वस्तुएं हमें मिलती हैं, वे सदा हमारे साथ नहीं रहती अतः हमें इस सत्य को स्वीकार कर लेना चाहिए कि इस संसार में प्राप्त कोई भी वस्तु, व्यक्ति, योग्यता, सामर्थ्य , धन-सम्पदा आदि मेरी नहीं है और सदा साथ रहने वाली नहीं है. अतः जो हमारे साथ सदा रहने वाली नहीं है, उसके बिना भी हम सदा के लिए सुखपूर्वक प्रसन्नता से रह सकते हैं.

सादर,

केशव राम सिंघल