Sunday, April 22, 2018

#071 - गीता अध्ययन एक प्रयास


*#071 - गीता अध्ययन एक प्रयास*

*ॐ*
*जय श्रीकृष्ण*

*गीता अध्याय 7 - दिव्य ज्ञान*


7/6
*एतद्योनीनि भूतानि सर्वाणीत्युपधारय।*
*अहं कृत्स्रस्य जगतः प्रभवः प्रलयस्तथा।।*


7/7
*मत्तः परतरं नान्यत्किञ्चिदस्ति धनञ्जय।*
*मय सर्वमिदं प्रोतं सूत्रे मणिगणा इव।।*


*भावार्थ*

भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं -
ऐसा तुम जानो कि सभी सृष्ट पदार्थों (प्राणियों) का स्रोत इन दोनों (परा और अपरा) प्रकृतियों का संयोग ही है. मैं (भगवान) सम्पूर्ण जगत का निमित्तकारण (प्रभव) और लीन करने वाला (प्रलय) हूँ. (7/6) हे धनञ्जय (अर्जुन) ! मुझसे (भगवान से) परे अन्य कुछ भी श्रेष्ठ नहीं है. यह जो हम देखते हैं वह सब कुछ (सम्पूर्ण जगत) मुझ (भगवान) में ही है, जैसे धागे में मणियाँ गुंथी रहती हैं. (7/7)

*प्रसंगवश*

यह संसार भगवान से ही उत्पन्न होता है, उसी के द्वारा रचाया-बसाया गया है और अंत में भगवान में ही लीन हो जाना है - ऐसा जानना 'ज्ञान' है. सब कुछ भगवान का स्वरूप ही है, भगवान के सिवाय दूसरा कुछ भी नहीं - ऐसा अनुभव हो जाना 'विज्ञान' है.

सादर,
केशव राम सिंघल

Wednesday, April 18, 2018

#070 - गीता अध्ययन एक प्रयास


*#070 - गीता अध्ययन एक प्रयास*
*ॐ*
*जय श्रीकृष्ण*

*गीता अध्याय 7 - दिव्य ज्ञान*


7/1
*श्रीभगवानुवाच*
*मय्यासक्तमनाः पार्थ योगं युञ्जन्मदाश्रयः ।*
*असंशयं समग्रं मां यथा ज्ञास्यसि तच्छृणु ।।*


7/2
*ज्ञानं तेअहं सविज्ञानमिदं वक्ष्याम्यशेषतः।*
*यञ्ज्ञात्वा नेह भूयोअन्यज्ज्ञातव्यमवशिष्यते।।*


7/3
*मनुष्याणां सहस्रेषु कश्चिद्यतति सिद्धये।*
*यततामपि सिद्धानां कश्चिन्मां वेत्ति तत्वतः।।*


7/4
*भूमिरापोअनलो वायुः खं मनो बुद्धिरेव च।*
*अहंकार इतीयं मे भिन्ना प्रकृतिरष्टधा।।*


7/5
*अपरिमेयमितस्त्वन्यान् प्रकृतिं विद्धि मे पराम्।*
*जीवभूतां महाबाहो ययेदं धार्यते जगत्।।*


*भावार्थ*

भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं -
हे अर्जुन ! जिसका मन मेरे में लग गया है और जिसे केवल मुझमें विश्वास है, वह जो भी कार्य (कर्मयोग, भक्तियोग) करता है, वह योग का अभ्यास ही है और ऐसा व्यक्ति मुझे (भगवान को) समग्र रूप से जान लेता है। जिस तत्व को तू जान सकता है, उसका मैं वर्णन करता हूँ, तू सुन। (7/1) अब मैं तुम्हें विज्ञान सहित ज्ञान (दिव्य ज्ञान) कहूंगा, जिसे जानने के बाद फिर इस विषय में जानने के लिए कुछ भी शेष नहीं रहेगा. (7/2) कई हजार मनुष्यों में से कोई एक इस प्रकार की सिद्धि के लिए प्रयत्न करता है और इस तरह की सिद्धि प्राप्त करने वालों में से कोई एक मुझे वास्तव में जान पाता है. (7/3) भूमि, जल, अग्नि, वायु, आकाश (पंचमहाभूत), मन, बुद्धि और अहंकार - आठ प्रकार से विभक्त मेरी अपरा (भौतिक) प्रकृतियाँ हैं. (7/4) हे महाबाहो (अर्जुन) ! इनके अतिरिक्त मेरी एक अन्य परा (चेतन) प्रकृति है, जो जीवरूप में इस जगत की भौतिक (अपरा) प्रकृति का उपयोग (विदोहन) कर रहे हैं. (7/5)


*प्रसंगवश*

अपरा = परिवर्तनशील
परा = अपरिवर्तनशील
जीव = परमात्मा का अंश, जो केवल स्थूल, सूक्ष्म और कारणशरीररूप प्रकृति के साथ सम्बन्ध जोड़ने से ही यह जीव बना है.

जीव अपने विभिन्न कार्यों के लिए अपरा शक्तियों (भौतिक प्रकृति) का उपयोग करता है. परा शक्ति (जीव) द्वारा यह संसार कार्यशील है. पराशक्ति (जीव) का नियंत्रण परमात्मा के पास है. जीव सर्वशक्तिमान नहीं, उसका स्वतन्त्र अस्तित्व नहीं, वह तो परमात्मा के नियंत्रण के अधीन है. जीव रूप परा प्रकृति ने ही अपरा प्रकृति को धारण कर रखा है.

माया के प्रभाव के कारण ही जीव (परा) का अहंकार (अपरा शक्ति) सोचता है - "मैं इस संसार को जीत सकता हूँ. ये सारी भौतिक उपलब्धियां मेरी हैं." जब जीव भौतिक विचारों से मुक्त हो जाता है, तभी वह वास्तविक स्थिति को प्राप्त हो पाता है.

जीव संसार की सत्ता को महत्व देता है, तभी तो वह कामना, सुख-भोग की इच्छा के कारण जन्म-मरण के बंधन में है.

गीता अध्याय 7 में भगवान श्रीकृष्ण ने दिव्य ज्ञान कहा है, जिसे सुनने में लाभ ही है।

जिसका मन स्वाभाविक तौर से भगवान की ओर खिंच जाता है और जिसे भगवान में विश्वास हो जाता है, वह भगवान के समग्र रूप को जान पाता है। सब कुछ भगवान ही हैं।

सादर,
केशव राम सिंघल



Friday, March 2, 2018

#069 - गीता अध्ययन एक प्रयास


*#069 - गीता अध्ययन एक प्रयास*

*ॐ*

*जय श्रीकृष्ण*

*गीता अध्याय 6 से मेरी सीख*


हमें मानव शरीर मिला है. यह अमूल्य है और इस जीवन में ही हमें अपना उद्धार करना है, ऐसा विचार करते हुए हमें निरर्थक संकल्पों से दूर रहना है. कर्मयोगी के रूप में दूसरों के हित में आसक्ति का त्याग करते हुए हमें कर्तव्य कर्म करना है. हमें यह विचार करना चाहिए और इस पर दृढ रहना चाहिए कि वास्तव में एक ही सता श्रीभगवान की है, संकल्पों या संसार की सत्ता नहीं है. अतः हमें संकल्पों से उदासीन रहना चाहिए, न ही राग करें और न ही द्वेष. मन में जितनी भी बातें आती हैं, वे प्रायः भूतकाल या भविष्यकाल से सम्बंधित होती हैं अर्थात् जो गया या जो होने वाला है, पर यह सब अभी (वर्तमान में) नहीं है. जो अभी नहीं है, उसके चिंतन में समय बरबाद करने से बेहतर है कि हम श्रीभगवान के चिंतन में अपने समय को लगाएं. श्रीभगवान सर्वदा हैं और अभी भी हैं, ऐसा विचार कर निर्लिप्तभाव मन में लाएं. हमें कर्मफल के प्रति आसक्ति (राग) त्यागकर कर्तव्य कर्म करना चाहिए, जिससे दूसरों का हित होता हो. संन्यास (सांख्ययोग) और योग (कर्मयोग) दोनों ही कल्याणकारी हैं, दोनों का फल भी एक ही है. त्याग से शान्ति मिलती है. कर्म करने के साथ कर्म का उद्देश्य महत्वपूर्ण है. आसक्ति रखने अथवा कामनापूर्ति के लिए कर्म करना और आसक्ति का त्याग करते हुए दूसरों के हित में कर्म करना , इन दोनों में बड़ा अंतर है. भोगी व्यक्ति अपने लिए कर्म करता है और कर्मयोगी दूसरों के लिए कर्म करता है.

जिसने अपनी आत्मा को जीत लिया अर्थात् जिसका अंतःकरण (मन) काबू में है, उसके लिए उसकी आत्मा उसका मित्र है, किन्तु जो ऐसा नहीं कर पाया उसके लिए उसका अंतःकरण (मन) उसका शत्रु बना रहेगा.

हमें शरीर, इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि, प्राणादि से अपने को ऊंचा उठाने का प्रयास करना चाहिए. जड़ वस्तुओं से सम्बन्ध त्यागना चाहिए. हमें यह समझ लेना चाहिए कि असत् के द्वारा सत् की प्राप्ति नहीं होती, वरन असत् के त्याग से सत् की प्राप्ति होती है. पदार्थ, क्रिया और संकल्पों में आसक्त ना हो. हममें ऐसी विचारशक्ति है, जिसको काम में लेने से हम अपना उद्धार कर सकते हैं. ज्ञानयोग, भक्तियोग या कर्मयोग (किसी भी एक साधन) द्वारा हम अपना उद्धार कर सकते हैं. अपने उद्धार और पतन में व्यक्ति स्वयं ही कारण होता है, दूसरा कोई नहीं.

'मैं' शरीर नहीं हूँ. 'मैं' अपरिवर्तनशील हूँ, जबकि 'शरीर' परिवर्तनशील है. 'मैं' कभी मरता नहीं. 'मैं' अविनाशी हूँ. यहाँ 'मैं' से तात्पर्य 'मेरे अंतःकरण' से है. इस 'मैं' में राग-द्वेष या लिप्तता का कोई भाव नहीं है. जब 'मैं' प्रकृतिजन्य पदार्थों से अपना सम्बन्ध स्थापित करता है तो निर्लिप्तता का भाव समाप्त हो जाता है और अहंकार, राग-द्वेष आदि उत्पन्न हो जाते हैं. उस समय मेरा 'मैं' स्वयं का शत्रु हो जाता है.

हमें समान भाव रखने अर्थात् समबुद्धि का प्रयास करना चाहिए, क्योंकि समबुद्धिवाला व्यक्ति निर्लिप्त रहता है. निर्लिप्त रहने से योग होता है, लिप्तता होते ही 'भोग' की स्थिति आ जाती है. बुराई रहित होना समता पाने का उपाय है. इसके लिए छः बातों का ध्यान रखें - किसी का बुरा ना मानें, किसी का बुरा ना करें, किसी का बुरा ना सोचें, किसी में बुराई ना देखें, किसी की बुराई ना सुने और किसी की बुराई ना कहें.

जिस समय परमात्मा का ध्यान हो, उस समय कोई भी सांसारिक वासना, आसक्ति, कामना, चाह, ममता, राग आदि नहीं होनी चाहिए. संयमित मन वाले व्यक्ति का सम्बन्ध संसार के मोह से नहीं बना रहता, बल्कि वह परमात्मा से अपना सम्बन्ध मानता है. संसार के त्याग अर्थात संसार से सम्बन्ध विच्छेद से शान्ति और परमात्मा की प्राप्ति से परमशान्ति (मोक्ष) मिलता है. श्रीभगवान श्रीकृष्ण का यह सन्देश स्पष्ट है की योग का अभ्यास करने के लिए व्यक्ति को आवश्यक भोजन और निद्रा लेनी चाहिए.

चित्त की पांच अवस्थाएं होती हैं - मूढ़, क्षिप्त, विक्षिप्त, एकाग्र और निरुद्ध. 'मूढ़' और 'क्षिप्त' व्यक्ति योग करने योग्य नहीं होता है. 'विक्षिप्त' व्यक्ति, जिसका चित्त कभी स्वरूप में लगता है और कभी नहीं लगता है, वह योग का प्रयास कर सकता है. जब चित्त 'एकाग्र' हो जाता है, तब सविकल्प समाधि होती है. एकाग्र होने के बाद चित्त 'निरुद्ध' अवस्था को प्राप्त करता है और यही निर्विकल्प समाधि अर्थात योग होता है.

दो बातें महत्वपूर्ण हैं - पहली, चित्त स्वरूप में स्थित हो जाए और दूसरी, संपूर्ण पदार्थों से निःस्पृहः हो जाए. मन में किसी वस्तु, व्यक्ति, परिस्थिति, काल आदि का चिंतन न हो और कोई काम, वासना, आशा आदि न हो.

निःस्पृहः होना = जब किसी पदार्थ और भोग की ज़रा भी इच्छा या परवाह नहीं हो.
यथायोग्य आहार = सत्य और न्यायपूर्वक अर्जित धन से प्राप्त भोजन, जो सात्त्विक, ववितर और शरीर के अनुकूल हो.
यथायोग्य विहार = ऐसा घूमना-फिरना जो स्वास्थ्य के लिए हितकर हो.
कर्तव्य कर्मों में यथायोग्य चेष्टा = देश, काल और परिस्थिति के अनुकूल शरीर निर्वाह के लिए कर्तव्य कर्म करना.
यथायोग्य सोना और जागना = इतनी ही निद्रा लेना, जो स्वास्थ्य के लिए हितकर हो, जिससे आलस्य न आए.

मन वस्तुतः बहुत चंचल होता है, पर हमें यह सीखना चाहिए कि ध्यानयोग के अभ्यास के लिए अंतर्मन को वश में करने की जरूरत है. ध्यानयोग में योगी इन्द्रियाँ-विषयों से दूर रहकर अपने स्वरूप में मन लगाने से वह अपने अंतर्मन को परमात्मा के ध्यान में स्थापित कर लेता है.

हमें परमात्मा की सत्ता को मानना चाहिए, तभी हम अपना अंतर्मन निरुद्ध कर परमात्मा की ओर लगा सकते हैं. इसमें कृष्ण का ध्यानयोग उपदेश हमें मार्ग दिखाता है. अभ्यास और वैराग्य द्वारा मन को काबू में किया जा सकता है.

अभ्यास = मन को बार-बार लक्ष्य (ध्येय) की ओर लगाना
वैराग्य = पदार्थ से विरक्ति और मन का आत्मा में प्रवृत होना.

साधन (अपने कल्याण के लिए प्रयत्न) करने वाले व्यक्ति दो तरह के होते हैं. पहला, वासना सहित साधक और दूसरा, वासना रहित साधक. वासना सहित साधक वह है, जिसकी साधन में श्रद्धा है और जो परमात्मा को पाने का यत्न तो करता है पर भोगों में उसकी रूचि सर्वदा समाप्त नहीं हुई है अतः वह साधन से विचलित होने पर योगभ्रष्ट हो जाता है. दूसरा साधक, जिसके भीतर वासना नहीं है, तीव्र वैराग्य तो है पर पूर्णता प्राप्त करनेसे पहले वह योगभ्रष्ट हो जाता है.

अनेकजन्मसंसिद्धः = ऐसा व्यक्ति जिसका मनुष्य जन्म में योग के यत्न से शुद्धि हुई, पर अंत समय में योग से विचलित होने के कारण स्वर्गादि लोकों में गया. वहाँ भोगों से अरुचि होने के कारण शुद्धि हुई और फिर मनुष्य जन्म लेकर योग के लिए प्रयत्न करने से शुद्धि हुई.

तपस्वी = ऋद्धि-सिद्धि पानेकेलिए जो भूख-प्यास, सर्दी-गर्मी आदि का कष्ट सहन करते हैं.

योगी = ऐसाव्यक्ति जो निष्कामभाव से परमात्मा प्राप्ति के लिए यत्न करता है.

ज्ञानी = शास्त्रों को जानने वाला विद्वान

कर्मिभ्य = ऐसा व्यक्ति जो इस लोक औरपरलोक में सुख की कामना करते हुए (सकाम भाव से) यज्ञ, दान, तीर्थ आदि शास्त्रीय कर्म करते हैं.

सादर,

केशव राम सिंघल



Monday, February 26, 2018

#068 - गीता अध्ययन एक प्रयास


*#068 - गीता अध्ययन एक प्रयास*

*ॐ*

*जय श्रीकृष्ण*

*गीता अध्याय 6 - ध्यानयोग - श्लोक 40 से 47*


6/40
*श्रीभगवानुवाच*
*पार्थ नैवेह नामुत्र विनाशस्तस्य विद्यते !*
*न ही कल्याणकृत्कश्चिद्दुर्गतिं तात गच्छति !!*


6/41
*प्राप्य पुण्यकृतां लोकानुषित्वा शाश्वतीयः !*
*शुचीनां श्रीमतां गेहे योगभ्रष्टोअभिजायते !!*


6/42
*अथवा योगिनामेव कुले भवति धीमताम् !*
*एतद्धि दुर्लभतरं लोके जन्म यदीदृशम् !!*


6/43
*तत्र तं बुद्धिसंयोग लभते पौर्वदेहिकम् !*
*यतते च ततो भूयः संसिद्धौ कुरुनन्दन !!*


6/44
*पूर्वाभ्यासेन तेनैव ह्रियते ह्यवशोअपि सः !*
*जिज्ञासुरपि योगस्य शब्दब्रह्मातिवर्तते !!*


6/45
*प्रयत्नाद्यतमानस्तु योगी संशुद्धकिल्बिषः !*
*अनेकजन्मसंसिद्धस्ततो याति परां गतिम् !!*

6/46
*तपस्वियोअधिको योगी ज्ञानिभ्यो अपिमतो अधिकः !*
*कर्मिभ्यश्चाधिको योगी तस्माद्योगी भवार्जुन !!*


6/47
*योगिनामपि सर्वेषां मद्गतेनान्तरात्मना !*
*श्रद्धावान्भजते यो मां सं मे युक्ततमो मतः !!*


*भावार्थ*

श्रीकृष्ण भगवान बोले -
हे प्रथानन्दन (अर्जुन) ! उसका ना तो इस लोक में और न परलोक में विनाश होता है. क्योंकि हे तात (मेरे मित्र) कल्याणकारी काम करने वाला कोई भी व्यक्ति दुर्गति को नहीं जाता. (6/40) योगभ्रष्ट व्यक्ति (जो व्यक्ति योग से विचलित हो गया है) पुण्यकर्म करने वालों के लोकों में अनेकानेक वर्षों तक रहने के बाद सदाचारी व्यक्तियों के घर में जन्म लेता है. (6/41) अथवा ज्ञानवान व्यक्तियों के कुल में जन्म लेता है. इस प्रकार का जो यह जन्म है, संसार में निसंदेह बहुत ही दुर्लभ है. (6/42) हे कुरुनन्दन (अर्जुन) ! वहाँ पर (ऐसा जन्म लेकर) उसको पहले मनुष्य जन्म की साधन-संपत्ति (अनायास ही) प्राप्त होती है, और फिर वह साधन की सिद्धि के विषय में पुनः प्रयास करता है. (6/43) वह (योगभ्रष्ट व्यक्ति) स्वयं के वश में न होता हुआ भी उस पूर्व मनुष्य जन्म में किए अभ्यास के कारण ही योग की ओर आकर्षित होता है क्योंकि योग (समता) का जिज्ञासु भी वेदों के सकाम कर्म का अतिक्रमण कर जाता है. (6/44) परन्तु जो व्यक्ति योग के लिए प्रयत्नपूर्वक कोशिश करता है और जिसके पाप नष्ट हो गए है तथा जो अनेक जन्मों में शुद्ध (सिद्ध) हुआ है, वह व्यक्ति परम गति (कल्याण) को प्राप्त होता है. (6/45) तवस्वी से योगी श्रेष्ठ है, ज्ञानी से भी योगी श्रेष्ठ है, कर्मियों से भी योगी श्रेष्ठ है, ऐसा मेरा मानना है, अतः हे अर्जुन तू योगी हो जा. (6/46) और सम्पूर्ण योगियों में जो भी श्रद्धावान भक्त मुझमें तल्लीन होकर अपने अन्तःकरण से मेरा भजन करता है, वह सर्वश्रेष्ठ है, ऐसा मेरा मत है. (6/47)


*प्रसंगवश*

साधन (अपने कल्याण के लिए प्रयत्न) करने वाले व्यक्ति दो तरह के होते हैं. पहला, वासना सहित साधक और दूसरा, वासना रहित साधक. वासना सहित साधक वह है, जिसकी साधन में श्रद्धा है और जो परमात्मा को पाने का यत्न तो करता है पर भोगों में उसकी रूचि सर्वदा समाप्त नहीं हुई है अतः वह साधन से विचलित होने पर योगभ्रष्ट हो जाता है. दूसरा साधक, जिसके भीतर वासना नहीं है, तीव्र वैराग्य तो है पर पूर्णता प्राप्त करनेसे पहले वह योगभ्रष्ट हो जाता है.

अनेकजन्मसंसिद्धः = ऐसा व्यक्ति जिसका मनुष्य जन्म में योग के यत्न से शुद्धि हुई, पर अंत समय में योग से विचलित होने के कारण स्वर्गादि लोकों में गया. वहाँ भोगों से अरुचि होने के कारण शुद्धि हुई और फिर मनुष्य जन्म लेकर योग के लिए प्रयत्न करने से शुद्धि हुई.

तपस्वी = ऋद्धि-सिद्धि पानेकेलिए जो भूख-प्यास, सर्दी-गर्मी आदि का कष्ट सहन करते हैं.

योगी = ऐसाव्यक्ति जो निष्कामभाव से परमात्मा प्राप्ति के लिए यत्न करता है.

ज्ञानी = शास्त्रों को जानने वाला विद्वान

कर्मिभ्य = ऐसा व्यक्ति जो इस लोक औरपरलोक में सुख की कामना करते हुए (सकाम भाव से) यज्ञ, दान, तीर्थ आदि शास्त्रीय कर्म करते हैं.

सादर,

केशव राम सिंघल



Thursday, February 15, 2018

*#067 - गीता अध्ययन एक प्रयास*


*#067 - गीता अध्ययन एक प्रयास*

*ॐ*

*जय श्रीकृष्ण*

*गीता अध्याय 6 - ध्यानयोग - श्लोक 37 से 39*


6/37
*अर्जुन उवाच*
*अयतिः श्रद्धयोपेतो योगाच्चलितमानसः !*
*अप्राप्य योगसंसिद्धिं कां गतिं कृष्ण गच्छति !!*


6/38
*कच्चिन्नोभयविभ्रष्टश्छिन्नाभ्रमिव नश्यति !*
*अप्रतिष्ठो महाबाहो विमूढो ब्रह्मणः पथि !!*


6/39
*एतन्मे संशयं कृष्ण छेत्तुमर्हस्यशेषतः !*
*त्वदन्य संशयस्यास्य छेत्ता न ह्युपपद्यते !!*


*भावार्थ*

अर्जुन श्रीकृष्ण से कहते हैं -
हे कृष्ण ! जिस व्यक्ति की साधन में श्रद्धा है, पर जिसका प्रयत्न शिथिल है और जो योग से विचलित हो जाए तो उस व्यक्ति की गति क्या होगी जो योगसिद्धि प्राप्त नहीं कर पाता. (6/37) हे महाबाहो (श्रीकृष्ण) ! संसार के आश्रय से रहित (अर्थात् जिसने संसार के सुख-आराम, आदर-सत्कार, यश-प्रतिष्ठा आदि कामना छोड़ दी हो) और परमात्मप्राप्ति के मार्ग में मोहित (विचलित) होने वाला ऐसा व्यक्ति जो दोनों (सांसारिक और पारमार्थिक) ओर से भ्रष्ट हो गया हो, क्या वह छिन्न-भिन्न बदल की तरह नष्ट तो नहीं हो जाता? (6/38) हे कृष्ण ! मेरे इस संदेह का पूरी तरह निराकरण करने के लिए आप ही योग्य हैं क्योंकि इस प्रकार के संशय (संदेह) का निराकरण करने वाला आपके सिवाय दूसरा कोई हो नहीं सकता. (6/39)

सादर,

केशव राम सिंघल



Friday, January 5, 2018

#066 - गीता अध्ययन एक प्रयास


*#066 - गीता अध्ययन एक प्रयास*

*ॐ*

*जय श्रीकृष्ण*

*गीता अध्याय 6 - ध्यानयोग - श्लोक 33 से 36*


6/33
*अर्जुन उवाच*
*योअयं योगस्त्वया प्रोक्तः साम्येन मधुसूदन !*
*एतस्याहं न पश्यामि चञ्चलत्वात्स्थितिं स्थिराम् !!*


6/34
*चञ्चलं हि मनः कृष्ण प्रमाधि बलवदृढम्!*
*तस्याहं निग्रहं मन्ये वायोरिव सुदुष्करम् !!*


6/35
*श्रीभगवानुवाच*
*असंशयं महाबाहो मनो दुर्निग्रहं चलम् !*
*अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते !!*


6/36
*असंयतात्मना योगो दुष्प्राप इति मे मतिः !*
*वश्यात्मना तु यतता शक़्योअवाप्तुमुपायतः !!*


*भावार्थ*

अर्जुन (श्रीकृष्ण से) कहते हैं:
हे मधुसूदन ! आपने जिस योग का वर्णन किया है, चञ्चल होने के कारण वह मेरे लिए स्थायी नहीं दिखता है. (6/33)

हे कृष्ण ! कारण कि मेरा मन चंचल, विचलित कर देने वाला, हठीला और बलवान है, उसको रोकना (वश में करना) मुझे वायु को वश में करने से भी कठिन लगता है. (6/34)

श्री कृष्ण अर्जुन से कहते हैं -
हे महाबाहो कुन्तीपुत्र (अर्जुन) ! इसमें कोई संशय नहीं कि यह मन बहुत ही चंचल है, जिसे वश में करना अत्यंत कठिन है, फिर भी अभ्यास और वैराग्य द्वारा इसे वश में किया जा सकता है. (6/35)

जिसका मन संयमित नहीं है, उसके द्वारा योग पाना कठिन है, लेकिन उपाय के साथ कोशिश करने वाले और वश में किए (संयमित) मन वाले व्यक्ति को यह योग प्राप्त हो सकता है, ऐसा मैं मानता हूँ. (6/36)

*प्रसंगवश*

गीता अध्याय 6 के श्लोक 33 और 34 में अर्जुन ने मन के चंचल और हठी होने की बात रखते हुए इस जिज्ञासा को सामने रखा कि कैसे मन को काबू में किया जाए. श्रीकृष्ण ने श्लोक 35 और 36 में अर्जुन की जिज्ञासा को शांत करने का प्रयास किया है और यह सन्देश दिया कि अभ्यास और वैराग्य द्वारा मन को काबू में किया जा सकता है.

अभ्यास = मन को बार-बार लक्ष्य (ध्येय) की ओर लगाना
वैराग्य = पदार्थ से विरक्ति और मन का आत्मा में प्रवृत होना.

सादर,

केशव राम सिंघल



Monday, January 1, 2018

#2018002 - हमारी विविधताएं ...


#2018002

*हमारी विविधताएं ...*

हमारी विविधताएं रंग भर देती हैं,
ये खुशियां ही हमें संग कर देती हैं,
आओ पहचानों इन विविध रंगों को,
यही तो जीवन में उमंग भर देती हैं !

- केशव राम सिंघल
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