Saturday, April 25, 2026

मानव अस्तित्व के नौ आयाम - शरीर, मन और कामनाएँ

मानव अस्तित्व के नौ आयाम - शरीर, मन और कामनाएँ 
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प्रतीकात्मक चित्र साभार NightCafe 



राजस्थान पत्रिका के प्रधान सम्पादक गुलाब कोठारी लिखते हैं - "हमारे तीन शरीर होते हैं, तीन ही मन होते हैं और तीन ही प्रकार की कामनाएँ भी होती हैं।" (राजस्थान पत्रिका, 25 अप्रेल 2026) 

इस आलेख में मैं गुलाब कोठारी के कथन की व्याख्या करने का प्रयास करूँगा। वर्णित कथन भारतीय दर्शन और मनोविज्ञान के उस गहरे पक्ष को सामने रखता है जहाँ मनुष्य को केवल एक भौतिक इकाई नहीं, बल्कि एक बहुआयामी अस्तित्व माना गया है। इस कथन की व्याख्या के लिए हमें तीन शरीर, तीन मन और तीन प्रकार की कामनाओं को समझना होगा। 

1. तीन शरीर (Three Bodies)
भारतीय तत्वज्ञान (विशेषकर वेदांत) के अनुसार, प्रत्येक मनुष्य के तीन स्तर के शरीर होते हैं जो एक-दूसरे से जुड़े होते हैं। 

* स्थूल शरीर (Physical Body) - यह वह शरीर है जिसे हम देख और छू सकते हैं। यह पंचमहाभूतों से बना है और भोजन से पोषित होता है।
* सूक्ष्म शरीर (Astral Body) - यह इंद्रियों, प्राणों और मन का समूह है। यह हमारी भावनाओं, विचारों और ऊर्जा का केंद्र है। मृत्यु के बाद भी यह आत्मा के साथ जुड़ा रहता है।
* कारण शरीर (Causal Body) - यह सबसे गहरा स्तर है, जहाँ हमारे संस्कारों और कर्मों के बीज संचित होते रहते हैं। भारतीय दर्शन में इसे 'अविद्या' या 'अज्ञान' का मूल स्थान माना गया है।

(1.1) कारण शरीर क्या है?
इसे 'कारण' इसलिए कहा जाता है, क्योंकि यही वह बीज (Seed) है जिससे हमारे अन्य दो शरीर उत्पन्न होते हैं। जैसे एक विशाल वटवृक्ष एक छोटे से बीज में छिपा रहता है, वैसे ही हमारे अनंत जन्मों के संस्कार और वासनाएँ इस कारण शरीर में 'संहिता' (Code) के रूप में संचित रहती हैं।

(1.2) कारण शरीर कहाँ रहता है? 
इसका कोई भौतिक स्थान नहीं होता। यह 'स्थान' की जगह 'अवस्था' का विषय है। सुषुप्ति (Deep Sleep) में, जहाँ न कोई सपना होता है, न शरीर का होश, वहाँ हम अपने कारण शरीर में स्थित होते हैं। यह आत्मा को ढंकने वाली अंतिम परत है।

(1.3) इसे एक सरल उदाहरण से समझने का प्रयास करते हैं - 
* स्थूल शरीर - कंप्यूटर के हार्डवेयर (स्क्रीन, कीबोर्ड) जैसा, जो दिखता है और जिसे छुआ जा सकता है।  
* सूक्ष्म शरीर - कंप्यूटर का ऑपरेटिंग सिस्टम और वह विद्युत प्रवाह (प्राण) जैसा, जो इसे गति देता है और क्रियाशील बनाता है।
* कारण शरीर - कंप्यूटर के हार्ड ड्राइव जैसा, जिसमें पिछला सारा डेटा और कोडिंग संचित है। इसी में वह बीज सुरक्षित है, जो अस्तित्व का भविष्य निर्धारित करता है। 

2. तीन मन (Three Minds)
मन की कार्यप्रणाली भी तीन स्तरों पर विभाजित है - 
* चेतन मन (Conscious Mind) - जो वर्तमान में तर्क करता है और बाहरी जगत से जुड़ा रहता है।
* अवचेतन मन (Subconscious Mind) - यह हमारी स्मृतियों और आदतों का भंडार है, जो शरीर की स्वचालित क्रियाओं (जैसे वाहन चलाते समय अचानक ब्रेक लगना) को नियंत्रित करता है।
* अतिचेतन मन (Superconscious Mind) - यह मन का वह उच्च धरातल है जहाँ तर्क समाप्त होता है और अंतर्ज्ञान का उदय होता है। यह हमें स्फुरणा या बोध का आभास देता है।

3. तीन प्रकार की कामनाएँ (Three Types of Desires)
कामनाओं को 'एषणा' कहा जाता है।  यह तीन प्रकार की होती हैं - 
* लोकैषणा - मान-सम्मान और प्रतिष्ठा पाने की इच्छा।
* वित्तैषणा - भौतिक सुख-सुविधाएँ और धन अर्जित करने की इच्छा।
* पुत्रैषणा (संतान प्राप्ति की इच्छा) - अपने वंश या अस्तित्व को जीवित रखने की इच्छा।

सार 

गुलाब कोठारी जी का कथन हमें यह प्रेरणा देता है कि मनुष्य का विकास तभी पूर्ण है जब वह भौतिक (स्थूल), मानसिक (सूक्ष्म) और आध्यात्मिक (कारण) तीनों स्तरों पर जाग्रत हो। इन तीनों के संतुलन से ही व्यक्ति 'स्वस्थ' (स्व + स्थ - अर्थात स्वयं में स्थित) होता है। 

सादर, 
केशव राम सिंघल

Saturday, April 18, 2026

पंचाग्नि विद्या

पंचाग्नि विद्या 
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प्रतीकात्मक चित्र साभार NightCafe 



हम इस संसार में हैं। यह सब ब्रह्म की यात्रा है, सूक्ष्म से स्थूल की यह दिव्य यात्रा। ब्रह्म पाँच अग्नियों में आहुत होकर स्थूल देह धारण करता है। इसी कारण हम कहते हैं कि हम सब आत्मा के अंश हैं। इन्हीं पाँच अग्नियों के ज्ञान को पंचाग्नि विद्या कहा जाता है। शाब्दिक अर्थ है — “पाँच अग्नियों का ज्ञान” या “पाँच अग्नियों पर ध्यान”। यह कोई शारीरिक अग्नि नहीं, बल्कि प्रतीकात्मक अग्नियाँ हैं, जिन पर गहन ध्यान और उपासना की जाती है।

यह विद्या सृष्टि के चक्र, जन्म-मृत्यु, पुनर्जन्म और जीव-ब्रह्मांड की अखंड एकता को समझाती है। समूची सृष्टि एक महान यज्ञ है, जिसमें सब कुछ परस्पर जुड़ा हुआ है।

पंचाग्नि के पाँच स्तर

पंचाग्नि के पाँच स्तर होते हैं। पंचाग्नि की ये निम्न पाँच अग्नियाँ क्रमिक रूप से सृष्टि चक्र को दर्शाती हैं - 

(1) स्वर्ग - द्युलोक, स्वर्ग अग्नि या आदित्याग्नि - पहली अग्नि - इसमें श्रद्धा की आहुति दी जाती है। इसका ईंधन सूर्य है, फलस्वरूप चन्द्रमा (सोम) उत्पन्न होता है।  
(2) पर्जन्य / बादल - पर्जन्याग्नि - दूसरी अग्नि - इसमें चन्द्रमा (सोम) की आहुति दी जाती है। ईंधन वर्ष (समय) है, फलस्वरूप वर्षा होती है। 
(3) पृथ्वी - पार्थिवाग्नि या भूम्यग्नि - तीसरी अग्नि -  इसमें वर्षा की आहुति दी जाती है, फलस्वरूप अन्न (अनाज) उत्पन्न होता है। 
(4) पुरुष - पुरुषाग्नि या मनुष्याग्नि - चौथी अग्नि - इसमें अन्न की आहुति दी जाती है, फलस्वरूप वीर्य (शुक्र) उत्पन्न होता है। 
(5) स्त्री - योषिदग्नि या स्त्री अग्नि - पांचवी अग्नि - इसमें वीर्य की आहुति दी जाती है, फलस्वरूप बच्चा (नया जीवन) जन्म लेता है। 

यह प्रक्रिया जीव की अद्भुत यात्रा को दर्शाती है। मृत्यु के बाद सूक्ष्म रूप में विभिन्न लोकों से गुजरना और फिर वर्षा-अन्न-वीर्य के रूप में पुनः स्थूल देह धारण करना। 

सार 

जन्म लेने में माता-पिता के प्रभाव के साथ पूरे ब्रह्मांड का प्रभाव होता है। यह विद्या हमें एकता का बोध कराती है कि आत्मा ब्रह्म से अलग नहीं है। सब कुछ एक ही स्रोत से निकलता है और अंत में उसी में लीन होता है। 
 
सादर, 
केशव राम सिंघल 

Saturday, April 11, 2026

अंतःकरण चतुष्टय और मैं

अंतःकरण चतुष्टय और मैं 

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चित्र साभार NightCafe


मैं सूक्ष्म रूप में 'अक्षर' (विनाशरहित) जीवात्मा हूँ, जो स्वयं 'अव्यय' परमात्मा का ही अंश है। जीवात्मा 'अक्षर पुरुष' है और परमात्मा 'पुरुषोत्तम' हैं, जो कभी नष्ट नहीं होते। जीवात्मा जब तक प्रकृति के गुणों से बंधी है, वह 'अक्षर' होकर भी 'क्षर' के खेल का हिस्सा बनी रहती है। मेरे चारों ओर व्याप्त यह दृश्यमान संसार 'क्षर' (परिवर्तनशील) माया का ही प्रसार है। यह शरीर (क्षेत्र) नाशवान है और केवल एक साधन मात्र है, जबकि इसमें स्थित मैं (क्षेत्रज्ञ) अविनाशी हूँ।

  

तात्विक रूप से आत्मा और जीवात्मा एक ही हैं, परंतु शरीर के बंधन में होने के कारण इसे जीवात्मा कहा जाता है। नाशवान शरीर में अपरा (परिवर्तनशील) प्रकृति के रूप में शरीर-मन-बुद्धि-अहंकार। नाशवान शरीर के भीतर 'अपरा प्रकृति' के रूप में मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार विद्यमान हैं। गीता (7.4) के अनुसार पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, मन, बुद्धि और अहंकार—ये आठ प्रकार की अपरा प्रकृति हैं। मन के दो रूप - इंद्रिय मन (बाह्य मन) और सर्वेंद्रिय मन (आंतरिक-संकल्प मन)। इन्द्रिय मन अर्थात् 'इन्द्रिय-अधिष्ठाता मन', जो इन्द्रियों को संचालित करता है। सर्वेन्द्रिय मन अर्थात् 'संकल्प-विकल्पात्मक मन' जो सोचता है। मन दोहरी भूमिका निभाता है—एक जो बाह्य इंद्रियों से सूचना ग्रहण करता है (इंद्रिय मन) और दूसरा जो आंतरिक अनुभवों का समन्वय करता है।


मेरे चारों ओर भरा पूरा संसार (माया) है, जिनके साथ मेरा आदान-प्रदान स्थूल मन-बुद्धि से होता है। माया इतनी प्रबल और सूक्ष्म है कि वह प्रखर बुद्धि को भी भ्रमित कर 'अहंकार' को ही सत्य सिद्ध कर देती है। अहंकार स्वयं को महत्व देता है। अहंकार को माया नहीं दिखती। अहंकार स्वयं माया का ही एक अंग है, इसलिए वह अपने स्रोत को नहीं पहचान पाता। माया अति सूक्ष्म बुद्धि को भ्रमित कर देती है। 


मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार - ये हमारे भीतर के चार उपकरण 'अंतःकरण चतुष्टय' कहलाते हैं। जैसे बाहर के कार्यों के लिए हमारे पास हाथ-पैर हैं, वैसे ही आतंरिक अनुभव और ज्ञान के लिए चार मानसिक शक्तियाँ काम करती हैं। मन का काम है संकल्प और विकल्प करना। "यह करूँ या वह करूँ?" यह द्वंद्व मन का स्वभाव है। बुद्धि का काम है निर्णय लेना। "यही सही है" यह निश्चयात्मक शक्ति बुद्धि है। चित्त हमारी चेतना का वह कोश है, जहाँ संस्कार और स्मृतियाँ (Memories) संचित रहती हैं। अहंकार में "मैं" का भाव रहता है अर्थात कर्तापन का बोध कि "मैं यह कर रहा हूँ" या "मैं सही हूँ"।


प्रारब्ध कर्म जीवात्मा से जुड़े होते हैं, शरीर से नहीं। प्रारब्ध कर्मों का संचय जीवात्मा (कारण शरीर) के साथ होता है, न कि भौतिक शरीर के साथ। इसी कारण मृत्यु के पश्चात भी संस्कार जीवात्मा के साथ गमन करते हैं। मृत्यु केवल स्थूल शरीर की होती है, जबकि सूक्ष्म और कारण शरीर जीवात्मा के साथ अगले पड़ाव की यात्रा करते हैं।


आइए मन और चित्त के बीच मुख्य अंतर को समझें। मन और चित्त दोनों एक-दूसरे से गहरे जुड़े हैं, फिर भी सूक्ष्म स्तर पर इन दोनों में अंतर है। मन का मुख्य कार्य इन्द्रियों के माध्यम से आने वाली सूचनाओं पर प्रतिक्रिया करना है, जबकि चित्त भूतकाल के अनुभवों, कर्मों और संस्कारों का भण्डार गृह है। मन का स्वभाव अत्यंत चंचल है। यह क्षण-क्षण में बदलता रहता है, संकल्प-विकल्प में अटका रहता है। चित्त का स्वभाव गहरा और स्थिर होता है। इसमें दबी हुई इच्छाएँ और पुराने संस्कार बीज रूप में रहते हैं, जो समय आने पर याद आ जाते हैं। मन की भूमिका एक संग्रहकर्ता की तरह है, जो बाहर से विषय-वस्तु चुनता है। चित्त भण्डार-गृह है, जहाँ पुरानी फाइलें (यादें) सुरक्षित रहती हैं। मन की प्रक्रिया - जब कोई कुछ देखता है तो उसका मन कहता है - यह क्या है? चित्त उसी समय पुरानी स्मृति से मिलान कर बताता है कि यह तो मैंने पहले भी देखा था। 


इसे हम एक उदाहरण से समझ सकते हैं। कल्पना कीजिए कि आप एक सुंदर दृश्य देख रहे हैं। आपका मन उस दृश्य को देखकर चकित होता है और विचार करता है कि यहाँ रुकूँ या आगे बढ़ूँ? (संकल्प-विकल्प)। उसी समय आपका चित्त उस दृश्य से जुड़ी आपकी पुरानी स्मृतियों को जाग्रत करता है। यदि आपने पहले कभी ऐसा दृश्य देखा था, तो उस समय का सुख या दुःख चित्त से ही उभर कर आएगा। आपकी बुद्धि यह निर्णय लेती है कि यह दृश्य वास्तव में सुंदर है या नहीं। क्या इसे देखा जाए या यहाँ से चला जाए? उसी समय आपका अहंकार यह अनुभव कर सोचता है कि "मैं" इस सुंदरता का आनंद ले रहा हूँ।


संक्षेप में 'मन' वह है जो अभी सक्रिय है और लहरों की तरह उठ रहा है, जबकि 'चित्त' वह गहरा सागर है जिसमें पूर्व जन्मों और इस जन्म के समस्त कर्म-संस्कार समाहित हैं।  


सादर, 

केशव राम सिंघल 

 

Sunday, January 11, 2026

प्रसंगवश - कर्म (KARMA) - वेदांत और गीता का सार

प्रसंगवश - 

कर्म (KARMA) - वेदांत और गीता का सार 

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प्रतीकात्मक चित्र साभार NightCafe 

अध्यात्म में जब हम अध्ययन करते है तो पाते हैं कि गीता और वेदांत के अनुसार, कर्मों का वर्गीकरण अलग-अलग आधारों पर किया गया है। वेदांत के अनुसार तीन तरह के कर्म बताए जाते हैं - क्रियमाण कर्म, संचित कर्म और प्रारब्ध कर्म।  


* संचित कर्म (Sanchita Karma) - यह हमारे अनंत जन्मों के कर्मों का वह विशाल भंडार है जो अभी "गोदाम" में जमा है। यह उस तर्कश (Quiver) की तरह है जिसमें बहुत सारे बाण रखे हैं।


 * प्रारब्ध कर्म (Prarabdha Karma) - संचित कर्मों का वह हिस्सा जो इस वर्तमान जीवन में फल देने के लिए "पक" चुका है। यह वह बाण है जो धनुष से छूट चुका है; इसे अब वापस नहीं लिया जा सकता, इसका फल भोगना ही पड़ता है। साधना और ईश्वर कृपा से प्रारब्ध के प्रभाव को सहने की शक्ति मिलती है, भले ही घटना अपरिवर्तनीय हो। 


 * क्रियमाण कर्म (Kriyaman Karma) - यह वह कर्म है जो हम अभी वर्तमान में कर रहे हैं। यह वह बाण है जिसे हमने अभी धनुष पर चढ़ाया है। हमारे पास इसे चलाने की दिशा बदलने की स्वतंत्रता (Free will) है। यही कर्म भविष्य में 'संचित' बन जाते हैं।


कर्म के बारे में सकाम और निष्काम कर्म की बात की जाती है। भगवान कृष्ण ने गीता (अध्याय 4, श्लोक 17) में कर्म की गति को समझाने के लिए तीन तरह के कर्म का ज्ञान दिया। 


 * कर्म (Karma) - शास्त्र सम्मत और उचित कार्य। 


 * विकर्म (Vikarma) - निषिद्ध या गलत कार्य (जो नहीं करने चाहिए)।


 * अकर्म (Akarma) - फल की इच्छा के बिना किया गया कर्म (निष्काम भाव से किया कर्म), जो मनुष्य को कर्मों के बंधन से मुक्त कर देता है।


संक्षेप में, सकाम और निष्काम, यह कर्म करने की नियत (Intention) बताते हैं। संचित, प्रारब्ध और क्रियमाण: यह कर्मों के समय और प्रभाव (Accumulation and Effect) को दर्शाते हैं। 


गीता में कर्मों का वर्गीकरण मुख्य रूप से दो आधारों पर किया गया है - एक जो कर्मों की प्रकृति (Nature) बताते हैं और दूसरे जो कर्म करने वाले के गुण (Gunas) पर आधारित हैं।

 

1. कर्म, विकर्म और अकर्म (गीता अध्याय 4)

भगवान कृष्ण ने अध्याय 4 के श्लोक 17 और 18 में कर्म की सूक्ष्म गति को समझाया है। यह वर्गीकरण सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है - 


कर्मणो ह्यपि बोद्धव्यं बोद्धव्यं च विकर्मणः।

अकर्मणश्च बोद्धव्यं गहना कर्मणो गतिः॥ (4.17)


भावार्थ - कर्म का स्वरूप भी समझना चाहिए, 'विकर्म' (गलत कर्म) का स्वरूप भी समझना चाहिए और 'अकर्म' का स्वरूप भी समझना चाहिए; क्योंकि कर्म की गति बहुत गहन (रहस्यमयी) है।


 * कर्म - शास्त्र सम्मत या कर्तव्य कर्म।


 * विकर्म - जो कर्म शास्त्र के विरुद्ध हों या पाप कर्म हों।


 * अकर्म - फल की इच्छा के बिना किया गया कर्म, जो मनुष्य को बंधन में नहीं डालता।


2. सकाम और निष्काम कर्म (अध्याय 2)


गीता अध्याय 2 का श्लोक 47 निष्काम कर्म का आधार है - 


कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।

मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि॥ (2.47)


भावार्थ - तेरा अधिकार केवल कर्म करने में है, उसके फलों में कभी नहीं। इसलिए तू कर्मों के फल का हेतु मत बन और तेरी आसक्ति कर्म न करने (अकर्मण्यता) में भी न हो। 


यहाँ यह स्पष्ट करना जरूरी है कि 'अकर्म' (निष्काम कर्म) और अकर्मण्यता (काम न करना या आलस्य) दो अलग चीजें हैं। अक्सर लोग अकर्म का अर्थ 'कुछ न करना' समझ लेते हैं, जो गलत है। 


3. गुणों के आधार पर कर्म (गीता अध्याय 18)


गीता अध्याय 18 में भगवान श्रीकृष्ण ने सत्त्व, रज और तम गुणों के आधार पर कर्म के तीन प्रकार बताए हैं - 


 * सात्त्विक कर्म (18.23) - जो कर्म नियत है, आसक्ति रहित है और राग-द्वेष के बिना, फल की इच्छा न रखने वाले व्यक्ति द्वारा किया गया है। 


 * राजस कर्म (18.24) - जो कर्म बहुत परिश्रम के साथ, फल की इच्छा रखने वाले या अहंकार से युक्त पुरुष द्वारा किया जाता है।


 * तामस कर्म (18.25) - जो कर्म परिणाम, हानि, हिंसा और अपनी सामर्थ्य का विचार किए बिना केवल मोहवश किया जाता है। 


निष्कर्ष (Conclusion) 


उपरोक्त विवेचन से यह स्पष्ट है कि हमारा भूतकाल 'प्रारब्ध' के रूप में सामने खड़ा है, जिसे धैर्य और साधना से स्वीकार करना चाहिए। लेकिन हमारा भविष्य पूरी तरह हमारे वर्तमान यानी 'क्रियमाण कर्म' पर निर्भर है। यदि हम अपने कर्मों को 'अकर्म' (निष्काम भाव) और 'सात्त्विक' गुणों से जोड़ लें, तो न केवल हम सुखी जीवन जी सकते हैं, बल्कि जन्म-मरण के इस कर्म-चक्र से मुक्त भी हो सकते हैं। अतः हाथ में लिए बाण (वर्तमान कर्म) को सही दिशा देना ही मनुष्य का वास्तविक पुरुषार्थ है।


संचित - आपका बैंक बैलेंस (पुराना जमा)।


प्रारब्ध - वर्तमान में मिलने वाली किश्त (EMI)।


क्रियमाण - वह नया निवेश जो आप आज कर रहे हैं।

 

सादर, 

केशव राम सिंघल