बाहर का शोर और भीतर की आवाज़
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बाहर इतना शोर है कि हम अपने अंदर की बात सुनना छोड़ चुके हैं। यह शोर अब सिर्फ़ आवाज़ नहीं रहा। यह लगातार आती विभिन्न सूचनाएँ हैं, विचार हैं, तुलनाएँ हैं, और वह दबाव है कि हर क्षण कुछ न कुछ करते या जानते रहना है। जब यह सब चलता रहता है, तो अंदर की आवाज़ धीमी पड़ जाती है। वह आवाज़ जो बताती है कि हम क्या महसूस कर रहे हैं, क्या सच में चाहते हैं, और क्या हमें शांत रखता है। अंदर की बात सुनने के लिए शांत भाव की ज़रूरत होती है। शांत भाव पैदा करने का एक सरल तरीका है स्थान बदलना, आँखें बंद करना, और चुपचाप बैठ या लेट जाना। शरीर को स्थिर करना अक्सर मन को भी थोड़ा स्थिर करने में मदद करता है। इस चुप्पी में बाहर का शोर कम होता है, और अंदर की गति साफ़ दिखाई देने लगती है।
मन स्वभाव से अत्यंत गतिशील है। विचार तेजी से आते और जाते हैं। यह कोई कमी नहीं, बल्कि मन की सामान्य प्रकृति है। जब हम चुप बैठते हैं, तो यह गति और अधिक स्पष्ट हो जाती है। यहाँ एक सूक्ष्म बात है। विचारों को पूरी तरह रोकने का प्रयास अक्सर मन को और सक्रिय कर देता है, क्योंकि “न सोचने” की कोशिश भी एक तरह की सोच ही है। इसलिए उपयोगी तरीका यह है कि विचारों को पकड़ने की कोशिश न की जाए। जब विचार को पकड़ा जाता है, तो वह रुकता है और बढ़ने लगता है। जब उसे पकड़ा नहीं जाता, तो वह आता है और चला जाता है। जैसे नदी का पानी किनारे खड़े व्यक्ति के सामने से बिना रुके बहता रहता है। इस “न पकड़ने” में एक छोटी-सी जगह बनती है। उसी जगह में शांत भाव धीरे-धीरे टिकने लगता है।
मन तेज़ दौड़ता रहे, लेकिन हम उसके साथ दौड़ने से बच सकते हैं। जितनी बार हम यह देखते हैं कि विचार आ रहे हैं और जा रहे हैं, उतनी बार हम उस गति से थोड़ा अलग खड़े हो जाते हैं। और यही अलग खड़ा होना, अंदर की आवाज़ सुनने की शुरुआत है। बाहर का शोर पूरी तरह बंद नहीं हो सकता। लेकिन मन के अंदर एक छोटी जगह बनाई जा सकती है, जहाँ शोर कम हो और अंदर की धीमी आवाज़ सुनाई दे। यह जगह अचानक नहीं बनती। स्थान बदलने, चुप बैठने, और विचारों को बिना पकड़े आने-जाने देने से धीरे-धीरे बनती है। शांत भाव कोई अंतिम अवस्था नहीं है। यह एक अभ्यास है। और यह अभ्यास जितना सरल है, उतना ही गहरा भी।
सादर,
केशव राम सिंघल
