प्रसंगवश -
कर्म (KARMA) - वेदांत और गीता का सार
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प्रतीकात्मक चित्र साभार NightCafe
अध्यात्म में जब हम अध्ययन करते है तो पाते हैं कि गीता और वेदांत के अनुसार, कर्मों का वर्गीकरण अलग-अलग आधारों पर किया गया है। वेदांत के अनुसार तीन तरह के कर्म बताए जाते हैं - क्रियमाण कर्म, संचित कर्म और प्रारब्ध कर्म।
* संचित कर्म (Sanchita Karma) - यह हमारे अनंत जन्मों के कर्मों का वह विशाल भंडार है जो अभी "गोदाम" में जमा है। यह उस तर्कश (Quiver) की तरह है जिसमें बहुत सारे बाण रखे हैं।
* प्रारब्ध कर्म (Prarabdha Karma) - संचित कर्मों का वह हिस्सा जो इस वर्तमान जीवन में फल देने के लिए "पक" चुका है। यह वह बाण है जो धनुष से छूट चुका है; इसे अब वापस नहीं लिया जा सकता, इसका फल भोगना ही पड़ता है। साधना और ईश्वर कृपा से प्रारब्ध के प्रभाव को सहने की शक्ति मिलती है, भले ही घटना अपरिवर्तनीय हो।
* क्रियमाण कर्म (Kriyaman Karma) - यह वह कर्म है जो हम अभी वर्तमान में कर रहे हैं। यह वह बाण है जिसे हमने अभी धनुष पर चढ़ाया है। हमारे पास इसे चलाने की दिशा बदलने की स्वतंत्रता (Free will) है। यही कर्म भविष्य में 'संचित' बन जाते हैं।
कर्म के बारे में सकाम और निष्काम कर्म की बात की जाती है। भगवान कृष्ण ने गीता (अध्याय 4, श्लोक 17) में कर्म की गति को समझाने के लिए तीन तरह के कर्म का ज्ञान दिया।
* कर्म (Karma) - शास्त्र सम्मत और उचित कार्य।
* विकर्म (Vikarma) - निषिद्ध या गलत कार्य (जो नहीं करने चाहिए)।
* अकर्म (Akarma) - फल की इच्छा के बिना किया गया कर्म (निष्काम भाव से किया कर्म), जो मनुष्य को कर्मों के बंधन से मुक्त कर देता है।
संक्षेप में, सकाम और निष्काम, यह कर्म करने की नियत (Intention) बताते हैं। संचित, प्रारब्ध और क्रियमाण: यह कर्मों के समय और प्रभाव (Accumulation and Effect) को दर्शाते हैं।
गीता में कर्मों का वर्गीकरण मुख्य रूप से दो आधारों पर किया गया है - एक जो कर्मों की प्रकृति (Nature) बताते हैं और दूसरे जो कर्म करने वाले के गुण (Gunas) पर आधारित हैं।
1. कर्म, विकर्म और अकर्म (गीता अध्याय 4)
भगवान कृष्ण ने अध्याय 4 के श्लोक 17 और 18 में कर्म की सूक्ष्म गति को समझाया है। यह वर्गीकरण सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है -
कर्मणो ह्यपि बोद्धव्यं बोद्धव्यं च विकर्मणः।
अकर्मणश्च बोद्धव्यं गहना कर्मणो गतिः॥ (4.17)
भावार्थ - कर्म का स्वरूप भी समझना चाहिए, 'विकर्म' (गलत कर्म) का स्वरूप भी समझना चाहिए और 'अकर्म' का स्वरूप भी समझना चाहिए; क्योंकि कर्म की गति बहुत गहन (रहस्यमयी) है।
* कर्म - शास्त्र सम्मत या कर्तव्य कर्म।
* विकर्म - जो कर्म शास्त्र के विरुद्ध हों या पाप कर्म हों।
* अकर्म - फल की इच्छा के बिना किया गया कर्म, जो मनुष्य को बंधन में नहीं डालता।
2. सकाम और निष्काम कर्म (अध्याय 2)
गीता अध्याय 2 का श्लोक 47 निष्काम कर्म का आधार है -
कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि॥ (2.47)
भावार्थ - तेरा अधिकार केवल कर्म करने में है, उसके फलों में कभी नहीं। इसलिए तू कर्मों के फल का हेतु मत बन और तेरी आसक्ति कर्म न करने (अकर्मण्यता) में भी न हो।
यहाँ यह स्पष्ट करना जरूरी है कि 'अकर्म' (निष्काम कर्म) और अकर्मण्यता (काम न करना या आलस्य) दो अलग चीजें हैं। अक्सर लोग अकर्म का अर्थ 'कुछ न करना' समझ लेते हैं, जो गलत है।
3. गुणों के आधार पर कर्म (गीता अध्याय 18)
गीता अध्याय 18 में भगवान श्रीकृष्ण ने सत्त्व, रज और तम गुणों के आधार पर कर्म के तीन प्रकार बताए हैं -
* सात्त्विक कर्म (18.23) - जो कर्म नियत है, आसक्ति रहित है और राग-द्वेष के बिना, फल की इच्छा न रखने वाले व्यक्ति द्वारा किया गया है।
* राजस कर्म (18.24) - जो कर्म बहुत परिश्रम के साथ, फल की इच्छा रखने वाले या अहंकार से युक्त पुरुष द्वारा किया जाता है।
* तामस कर्म (18.25) - जो कर्म परिणाम, हानि, हिंसा और अपनी सामर्थ्य का विचार किए बिना केवल मोहवश किया जाता है।
निष्कर्ष (Conclusion)
उपरोक्त विवेचन से यह स्पष्ट है कि हमारा भूतकाल 'प्रारब्ध' के रूप में सामने खड़ा है, जिसे धैर्य और साधना से स्वीकार करना चाहिए। लेकिन हमारा भविष्य पूरी तरह हमारे वर्तमान यानी 'क्रियमाण कर्म' पर निर्भर है। यदि हम अपने कर्मों को 'अकर्म' (निष्काम भाव) और 'सात्त्विक' गुणों से जोड़ लें, तो न केवल हम सुखी जीवन जी सकते हैं, बल्कि जन्म-मरण के इस कर्म-चक्र से मुक्त भी हो सकते हैं। अतः हाथ में लिए बाण (वर्तमान कर्म) को सही दिशा देना ही मनुष्य का वास्तविक पुरुषार्थ है।
संचित - आपका बैंक बैलेंस (पुराना जमा)।
प्रारब्ध - वर्तमान में मिलने वाली किश्त (EMI)।
क्रियमाण - वह नया निवेश जो आप आज कर रहे हैं।
सादर,
केशव राम सिंघल