Sunday, January 15, 2017

#054 - गीता अध्ययन एक प्रयास


*#054 - गीता अध्ययन एक प्रयास*

*ॐ*

*जय श्रीकृष्ण*


*गीता अध्याय 5 - कर्म संन्यास योग - श्लोक 19 और 20*

5/19
*इहैव तैर्जितः सर्गो येषां साम्ये स्थितं मनः !*
*निर्दोषं हि समं ब्रह्म तस्माद्ब्रह्मणि ते स्थिताः !!*


5/20
*न प्रह्रण्येत्प्रियं प्राप्य नोद्विजेत्प्राप्य चाप्रियम् !*
*स्थिरबुद्धिरसम्मूढो ब्रह्मविद् ब्रह्मणि स्थितः !!*


*भावार्थ*

(श्रीकृष्ण अर्जुन से)
जिनका (जिन व्यक्तियों का) अंतःकरण (मन) समभाव (समता) में स्थित है, उन्होंने जीते-जी (इस जीवित अवस्था में) ही संपूर्ण संसार जीत लिया है, क्योंकि ब्रह्म (परमात्मा) निर्दोष और सम है, इसलिए वे (सभी व्यक्ति) ब्रह्म (परमात्मा) में स्थित रहते हैं. (5/19)

जो व्यक्ति प्रिय को पाकर हर्षित न हो और अप्रिय को पाकर उद्विग्न (विचलित) न हो, वह स्थिरबुद्धिवाला ज्ञानी व्यक्ति ब्रह्म (परमात्मा) को जाननेवाला ब्रह्म में स्थित रहता है. (5/20)

*जिज्ञासा*

*अंतःकरण में समता कब आती है?*

परमात्मा का ध्यान करने से जब मन-बुद्धि में राग-द्वेष, कामना, विषमता आदि का सर्वदा अभाव हो जाता है, तब अंतःकरण में स्वतः ही समता आ जाती है. सभी कुछ तो परमात्मा (भगवान) का है तो फिर किसी से कैसा द्वेष, राग या मोह .... यही भाव हमें समता की ओर ले जाता है.

*प्रिय और अप्रिय को प्राप्त करना क्या है?*

शरीर, इन्द्रियाँ, मन और बुद्धि के अनुसार अनुकूल प्राणी, पदार्थ, घटना या परिस्थिति की प्राप्ति होना ही 'प्रिय' को प्राप्त करना है और शरीर, इन्द्रियाँ, मन और बुद्धि के अनुसार प्रतिकूल (अनुकूल के विपरीत) प्राणी, पदार्थ, घटना या परिस्थिति की प्राप्ति होना ही 'अप्रिय' को प्राप्त करना है.

सादर,

केशव राम सिंघल



Saturday, January 14, 2017

#053 - गीता अध्ययन एक प्रयास


*#053 - गीता अध्ययन एक प्रयास*

*ॐ*
*जय श्रीकृष्ण*

*गीता अध्याय 5 - कर्म संन्यास योग - श्लोक 16 से 18*


5/16
*ज्ञानेन तु तदज्ञानं येषां नाशितमात्मनः !*
*तेषामादित्यवज्ज्ञानं प्रकाशयति तत्परम्!!*


5/17
*तद्बुद्धयस्तदात्मानस्तन्निष्ठास्तत्परायणा: !*
*गच्छन्त्यपुनरावृत्तिं ज्ञाननिर्धूतकल्मषा: !!*


5/18
*विद्याविनयसम्पन्ने ब्राह्मणे गवि हस्तिनि !*
*शुनि चैव श्वपाके च पण्डिताः समदर्शिनः !!*


*भावार्थ*

(श्रीकृष्ण अर्जुन से)

पर जिसने अपने ज्ञान (आत्मज्ञान) से उस अज्ञान का नाश कर दिया है, उनका वह् ज्ञान सूर्य के समान परमतत्व परमात्मा को प्रकाशित कर देता है. (5/16)

जिसका मन और बुद्धि परमात्मा में स्थित है और जिनकी निष्ठा परमतत्व परमात्मा में है, ऐसे व्यक्ति ज्ञान के द्वारा पापरहित होकर परमगति को प्राप्त होते हैं. (5/17)

ज्ञानीजन विद्या और विनययुक्त ब्राह्मण और चांडाल, गाय, हाथी और कुत्ते को भी समान दृष्टि से देखते हैं. (5/18)

*प्रसंगवश*

जब अज्ञान समाप्त होता है तो अंधकार मिटता है. एक बार ज्ञान हो गया तो अज्ञान सर्वदा के लिए मिट जाता है. अज्ञान का नाश विवेक से होता है.

परमगति = जीवन-मरण (पुनर्जन्म) के बंधन से मुक्त हो जाना

सादर,

केशव राम सिंघल



Saturday, January 7, 2017

052 - गीता अध्ययन एक प्रयास


*#052 - गीता अध्ययन एक प्रयास*

*ॐ*
*जय श्रीकृष्ण*

*गीता अध्याय 5 - कर्म संन्यास योग - श्लोक 13, 14 और 15*


5/13
*सर्वकर्माणि मनसा संन्यस्यास्ते सुखं वशी !*
*नवद्वारे पुरे देही नैव कुर्वन्न कारयन् !!*


5/14
*न कर्तृत्वं न कर्माणि लोकस्य सृजति प्रभु !*
*न कर्मफलसंयोगं स्वभावस्तु प्रवर्तते !!*


*भावार्थ*

(श्रीकृष्ण अर्जुन से)

जिसकी इन्द्रियाँ और मन (अर्थात जिसका अंतःकरण) वश में है, ऐसा संयमी व्यक्ति सभी कर्मों का मन से परित्याग करके नौ द्वारों वाले भौतिक शरीर रूपी नगर में सुख से रहता हुआ न तो कर्म करता है और ना ही करवाता है. (5/13)

परमात्मा (भगवान) मनुष्यों के लिए ना तो कर्म का सृजन करता है, ना कर्म करने के लिए प्रेरित करता है, ना ही कर्मफल की रचना करता है. यह सब तो प्रकृति के गुणों द्वारा ही किया जाता है. (5/14)

*प्रसंगवश*

नौ द्वारों वाला भौतिक शरीर = मनुष्य शरीर जिसमें दो कान, दो नेत्र, दो नासिका छिद्र, एक मुख तथा मल-मूत्र का त्याग करने के लिए उपस्थ और गुदा.

सर्वकर्माणि = सभी कर्मों का = शरीर, इन्द्रियों, मन, बुद्धि और प्राणों से होने वाली तेरह क्रियाएं

प्रकृति सदैव क्रियाशील रहती है. अतः सम्बन्ध बनाकर रहने के कारण व्यक्ति कर्मरहित नहीं हो सकता, पर राग और आसक्ति का त्याग कर व्यक्ति उन क्रियाओं का कर्ता नहीं बनता.

कर्म (या कर्तव्य) का सृजन, कर्म का करना और कर्मफल का संयोग परमात्मा (भगवान) की सृष्टि (रचना) नहीं है, बल्कि यह प्रकृति और जीव की सृष्टि (रचना) है.

*जिज्ञासा*

जब परमात्मा (भगवान) कर्तव्य, कर्म और कर्मफल का सृजन नहीं करते तो कोई कैसे कर्मों के फलभागी हो सकता है?

इस जिज्ञासा को श्रीकृष्ण आगे के श्लोक में स्पष्ट करते हैं.

5/15
*नादत्ते कस्यचित्पापं न चैव सुकृतं विभु: !*
*अज्ञानेनावृतं ज्ञानं तेन मुह्यन्ति जन्तवः !!*


(श्रीकृष्ण उपदेश देते हैं) -
परमात्मा (भगवान) न तो किसी के पापकर्म को और न ही पुण्यकर्म को ग्रहण करते हैं, लेकिन सारे जीव अज्ञान से आच्छादित रहने के कारण मोहित हो रहे हैं. (5/15)

सादर,

केशव राम सिंघल


#051 - गीता अध्ययन एक प्रयास


*#051 - गीता अध्ययन एक प्रयास*

*ॐ*
*जय श्रीकृष्ण !*

*गीता अध्याय 5 - कर्म संन्यास योग - श्लोक 10, 11 और 12*


5/10
*ब्रह्मण्याधाय कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा करोति यः !*
*लिप्यते न स पापेन पद्मपत्रमिवाम्भसा !!*


5/11
*कायेन मनसा बुद्ध्या केवलैरिन्द्रियैरपि !*
*योगिनः कर्म कुर्वन्ति सङ्गं त्यक्त्वात्मशुद्धये !!*


5/12
*युक्तः कर्मफलं व्यक्तवा शान्तिमाप्नोति नैष्ठिकीम् !*
*अयुक्तः कामकारेण फल सक्तो निबध्यते !!*


*भावार्थ*

(श्रीकृष्ण अर्जुन से)
जो व्यक्ति अपने संपूर्ण कर्मों को परमात्मा में अर्पण कर आसक्ति (राग, द्वेष, लगाव, ममता, कामना) का त्याग करके अपने सभी कर्म करता है, वह जल में रहने वाले कमल के पत्ते की तरह पाप से निर्लिप्त रहता है. *तात्पर्य* -जिस प्रकार कमल का पत्ता जल में पैदा होकर और जल में ही रहकर जल से निर्लिप्त रहता है, उसी प्रकार भक्ति में संलग्न व्यक्ति संसार में रहकर अपनी सभी क्रियाएं करने पर भी भक्ति के कारण संसार से और संसार में हमेशा निर्लिप्त रहता है. (5/10)

कर्मयोगी (कर्तव्य-कर्म करने वाला व्यक्ति) आसक्ति (राग, द्वेष, लगाव, ममता, कामना) का त्याग कर केवल इंद्रियों, शरीर, मन और बुद्धि से अंतःकरण शुद्धि के लिए कर्म करता है. (5/11)

कर्मयोगी कर्मफल का त्याग कर नैष्ठिकी शान्ति को प्राप्त होता है, पर सकाम व्यक्ति कामना के कारण फल में आसक्त होकर बांध जाता है. (5/12)

नैष्ठिकी शान्ति = ऐसी परमशान्ति जो परमात्मा को प्राप्त होने से प्राप्त होता है.
सकाम व्यक्ति = ऐसा व्यक्ति जो कामना (राग, आशा, आसक्ति आदि) का त्यागनहीं कर पाता है.


*प्रसंगवश*

कर्मों के फल चार प्रकार के होते हैं -
(1) *दृष्ट कर्मफल* - ऐसा कर्मफल जो तत्काल दिखता प्रतीत होता है. जैसे - पानी पीने से प्यास का समाप्त हो जाना.
(2) *अदृष्ट कर्मफल* - ऐसा कर्मफल जो संचित होकर संग्रहित होता रहता है और भविष्य में (इस लोक या परलोक में) सुख या दुःख के रूप में मिलता है.
(3) *प्राप्त कर्मफल* - प्रारब्ध-कर्म के अनुसार वर्तमान में मिला यह शरीर, धन, सम्पदा, अनुकूल या प्रतिकूल परिस्थिति
(4) *अप्राप्त कर्मफल* - प्रारब्ध-कर्म के अनुसार भविष्य में मिलने वाला फलरूप, जैसे - धन, संपत्ति, अनुकूल या प्रतिकूल परिस्थिति


ब्रह्म = ईश्वर जो समग्र गुणों से भरपूर सगुण, निर्गुण, साकार, निराकार सबकुछ है.

गीता में ब्रह्म के तीन नाम बताए गए हैं - ॐ, तत् और सत्.

सादर,

केशव राम सिंघल

Wednesday, January 4, 2017

#050 - गीता अध्ययन एक प्रयास


*#050 - गीता अध्ययन एक प्रयास*

*ॐ*
*जय श्रीकृष्ण !*

*संक्षेप में*


*जीव, आत्मा और परमात्मा*

परमात्मा = ईश्वर, श्रीभगवान
परमात्मा, जिसको पाने से परमशांति मिलती है.

जीव = वह जिसमें एक चेतन परमात्मा का अंश है और एक जड़ प्रकृति का अंश है. जीव में सत् और असत् (अर्थात् आत्मा और पदार्थ) दोनों होते हैं.

जीव का चेतन अंश परमात्मा की प्राप्ति की इच्छा करता है, पर जीव का जड़ अंश संसार की इच्छा करता है. हमें समझना चाहिए कि सांसारिक इच्छाओं की पूर्ति का कोई अंत ही नहीं है, आसक्ति के कारण नई इच्छाएं पैदा होती रहती हैं.

जीव जब परमात्मा को प्राप्त करता तो जीव को परमशान्ति प्राप्त होती है.

आत्मा = सत्
आत्मा परमात्मा का सूक्ष्म अंश ही है. यह अपरिवर्तित, अविनाशी, अव्यय, अप्रमेय तथा शाश्वत है. आत्मा के लिए किसी काल में ना तो जन्म है, ना ही मृत्यु. आत्मा ना तो कभी जन्मा, ना जन्म लेता है और ना ही कभी लेगा. आत्मा अजन्मा, नित्य, शाश्वत और पुरातन है.

शरीर के मारे जाने पर भी आत्मा मारा नहीं जाता.

आत्मा के बारे में अधिक जानने के लिए कृपया गीता अध्याय 2 के अध्ययन की सादर सलाह है.

सादर,

केशव राम सिंघल


Monday, January 2, 2017

#049 - गीता अध्ययन एक प्रयास


*#049 - गीता अध्ययन एक प्रयास*

*ॐ*
*जय श्रीकृष्ण !*

*गीता अध्याय 5 - कर्म संन्यास योग - श्लोक 8 और 9*


5/8
*नैव किंचित्करोमीति युक्तो मन्येत तत्त्ववित् !*
*पश्यंश्रृण्वन्स्पृशंजिघ्रन्नश्नन्गच्छन्स्वपन्शवसन् !!*


5/9
*प्रलपंविसृजंगृन्हन्नुन्मिषन्निमिषन्नपि !*
*इंद्रियाणीद्रियार्थेषु वर्तन्त इति धारयन् !!*


*भावार्थ*

(श्रीकृष्ण अर्जुन से)
देखता हुआ, सुनता हुआ, स्पर्श करता हुआ, सूँघता हुआ, खाता हुआ, चलता हुआ, ग्रहण (स्वीकार) करता हुआ, बोलता हुआ, त्यागता हुआ, सोता हुआ, श्वास लेता हुआ, आँख खोलता हुआ और आँख मूँदता हुआ भी तत्व को जानने वाला संन्यासी ऐसा समझकर कि सभी इन्द्रियाँ अपने-अपने विषयों में संलग्न (प्रवृत) है, ऐसा मानता है कि वह स्वयं कुछ नहीं करता.

*प्रसंगवश*

उपर्युक्त दोनों श्लोकों में व्यक्ति की तेरह क्रियायों का उल्लेख किया गया है. व्यक्ति की ये तेरह क्रियाएं ज्ञानेन्द्रियों, कामेन्द्रियों, अंतःकरण, प्राण और उपप्राण द्वारा होती हैं. संन्यासी (सांख्ययोगी) शरीर, इन्द्रियों, अंतःकरण आदि के साथ अपना सम्बन्ध नहीं मानता, इसलिए ऐसा मानता है कि वह इन तेरह क्रियाओं का कर्ता नहीं है.

सादर,

केशव राम सिंघल


Thursday, December 29, 2016

#048 - गीता अध्ययन एक प्रयास


*#048 - गीता अध्ययन एक प्रयास*

*ॐ*
*जय श्रीकृष्ण !*


*गीता अध्याय 5 - कर्म संन्यास योग - श्लोक 6 और 7*

5/6
*सन्न्यास्तु महाबाहो दु:खमाप्तुमयोगत: !*
*योगयुक्तो मुनिर्ब्रह्म नचिरेणाधिगच्छति !!*


5/7
*योगयुक्तो विशुद्धात्मा विजितात्मा जितिन्द्रियः !*
*सर्वभूतात्मभूतात्मा कुर्वन्नपि न लिप्यते !!*


*भावार्थ*

(श्रीकृष्ण अर्जुन से)
परन्तु, हे महाबाहो (अर्जुन) ! कर्मयोग के बिना संन्यास (सांख्ययोग) पाना कठिन है. मननशील कर्मयोगी (कर्तव्य-कर्म करने वाला व्यक्ति) शीघ्र ही ब्रह्म (परमात्मा) को प्राप्त कर लेता है. (5/6)

ऐसा कर्मयोगी (कर्तव्य-कर्म करने वाला व्यक्ति) कर्म करते हुए भी कर्मों से नहीं बंधता है, जिसकी इन्द्रियाँ उसके वश में हैं, जिसका अंतःकरण निर्मल है, जिसने अपने शरीर को वश में किया हुआ है और जिसकी आत्मा ही सभी प्राणियों की आत्मा है. (5/7)

सादर,

केशव राम सिंघल