ब्रह्म और माया - मौन से शब्द की यात्रा
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ब्रह्म निराकार है और माया का मूल कार्य उस निराकार को साकार रूप देना है। सृष्टि का आदि सूत्र ब्रह्म की उसी कामना में निहित है जिसे 'एकोहं बहुस्याम्' (मैं एक हूँ, बहुत हो जाऊँ) कहा गया है। एकांत से अनेकता की ओर बढ़ने की दिव्य इच्छा ही माया की भूमिका को जन्म देती है। यद्यपि ब्रह्म और माया के मूल स्वरूप में न शब्द हैं, न ध्वनि और न ही प्रकाश, क्योंकि समस्त तत्व 'शब्दशून्य' यानी मौन के धरातल पर ही अंकुरित होते हैं। ब्रह्म का मौन किसी रिक्तता का नाम नहीं, बल्कि वह 'पूर्णता का मौन' है।
शब्द का प्रादुर्भाव आकाश तत्त्व से होता है और वह माया की प्रथम अभिव्यक्ति है। माया वह शक्ति है जो स्पंदन (Vibration) और प्रकाश उत्पन्न करती है। यहाँ विचारणीय है कि ब्रह्म का मौन 'चैतन्य' है, जबकि माया का मौन मात्र एक 'क्षणिक निवृत्ति' या विश्राम है। मौन वह ऊर्जा है जो व्यक्ति के भीतर विचारों को दिशा देती है, यह सकारात्मक भी हो सकती है और नकारात्मक भी, जो पूर्णतः हमारे आंतरिक वातावरण पर निर्भर करती है।
मौन की अवस्था में शरीर शांत रहता है, किंतु मन सक्रिय होकर विचारों को 'सूक्ष्म शरीर' में ले जाता है। यहाँ विचारों की गति तीव्र और गहन हो जाती है क्योंकि बाहरी जगत से संपर्क कट जाता है। वास्तव में, मौन ही माया की वह गुप्त भाषा है, जिसके माध्यम से जीव अपने आप से संवाद करता है।
सृष्टि के चक्र को देखें तो शब्द शरीर का क्षेत्र है, मौन मन का, और इन दोनों से परे की अवस्था आत्मा का क्षेत्र है। जिस 'कारण शरीर' में आत्मा का निवास माना गया है, वह गहन अंधकार और मौन का धरातल है। यह विरोधाभास नहीं, बल्कि शाश्वत सत्य है कि संपूर्ण सृष्टि मौन और अंधकार से ही उत्पन्न होती है; जैसे सूर्य रात्रि के गर्भ से प्रकट होता है, वैसे ही प्रकाश अंधकार की कोख में पलता है और शब्द, मौन की गहराइयों से जन्म लेता है।
जन्म और मृत्यु दोनों ही मौन की घटनाएँ हैं। अतः मौन ही वह द्वार है जहाँ से हम माया के साम्राज्य में प्रवेश करते हैं और वहीं से पुनः ब्रह्म की पूर्णता की ओर लौट सकते हैं।
सादर,
केशव राम सिंघल