अपने विचारों को अभिव्यक्त करने का प्रयास, चाहे वे आपके विचारों से भिन्न ही क्यों ना हों .... पाठकों की टिप्पणी का स्वागत है, पर भाषा शालीन हो, इसका निवेदन है .... - केशव राम सिंघल, अजमेर, भारत.
Saturday, May 9, 2026
ज्ञान (Knowledge)
Thursday, May 7, 2026
ज्ञानेन्द्रियाँ, कमेन्द्रियाँ और मन
ज्ञानेन्द्रियाँ, कमेन्द्रियाँ और मन
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प्रतीकात्मक चित्र साभार जेमिनी गूगल
शरीर के माध्यम से हमें हमारे अस्तित्व का बोध होता है। हमारी चेतना का वाहक हमारा शरीर है। हमारे तीन स्तर के शरीर होते हैं - स्थूल शरीर, सूक्ष्म शरीर और कारण शरीर। शरीर ही हमारी अभिव्यक्ति का माध्यम है। स्थूल शरीर को चेतना और दिशा सूक्ष्म और कारण शरीर से मिलती है। हमारे भीतर के चार उपकरण 'अंतःकरण चतुष्टय' - मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार - हमारे निर्णय को प्रभावित करते रहते हैं। स्थूल शरीर के सभी क्रियाकलापों और हाव-भावों की अभिव्यक्ति में इन्द्रियों की भूमिका रहती है। पाँच ज्ञानेन्द्रियों (आँख, नाक, कान, त्वचा और जिह्वा) से हम पाँच विषयों क्रमशः रूप, गंध, शब्द, स्पर्श और स्वाद को जान पाते हैं।
आँख का विषय रूप है और गुण तेज है। सूर्य और अग्नि से हमें प्रकाश मिलता है, तभी हम देख पाते हैं। प्रकाश न हो तो हम देख पाते क्या? नहीं ना। इसी प्रकार, नाक का विषय गंध और गुण पृथ्वी है। कान का विषय शब्द और गुण आकाश है। त्वचा का विषय स्पर्श और गुण वायु है। जिह्वा (जीभ) का विषय स्वाद (रस) और गुण जल है। ज्ञानेन्द्रियों के बिना विषयों का ज्ञान नहीं हो सकता। जिसके आँखें नहीं होती, वह देख नहीं सकता अर्थात् रूप जान नहीं सकता। पाँच कमेन्द्रियाँ (हाथ, पैर, मुख, गुदा और उपस्थ-जननेन्द्रिय) हमारे प्राकृतिक कार्यों को करने के साधन हैं। हाथ से हम वस्तुओं का आदान-प्रदान करते हैं। पैर से हम चलते हैं, गतिशील रहते हैं। मुख से हम खाना खाते हैं, बोलते हैं। गुदा से हम मल और पाद का विसर्जन करते हैं। उपस्थ-जननेन्द्रिय के माध्यम से हम मूत्र का विसर्जन करते हैं और यही इन्द्रिय वंश-वृद्धि का भी आधार है। ये सभी आध्यात्मिक क्रियाएँ हैं और इस प्रकार आध्यात्मिक यज्ञ हमारे शरीर में निरंतर चलता रहता है।
इन्द्रियों को समन्वित करने वाला हमारा मन हमारी इच्छाओं को प्रभावित करता है। मन के बारे में कहा जाता है कि यह एक समय में एक ही काम करता है, पर इसकी गति इतनी तेज होती है कि हमें लगता है कि हमारा मन एक समय में कई काम करता है। वास्तव में मन बहुत चंचल होता है, भटकता बहुत तेजी से है, कभी इधर तो कभी उधर, पर एक समय में यह एक ही काम करता हे। इसके द्वारा किए गए कार्यों में काल का बहुत ही सूक्ष्म अंतर होता है। इसकी गति इतनी तीव्र होती है कि यह एक क्षण या पल में मन कई काम कर लेता है।
सादर,
केशव राम सिंघल
Saturday, May 2, 2026
ब्रह्म और माया - मौन से शब्द की यात्रा
ब्रह्म और माया - मौन से शब्द की यात्रा
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ब्रह्म निराकार है और माया का मूल कार्य उस निराकार को साकार रूप देना है। सृष्टि का आदि सूत्र ब्रह्म की उसी कामना में निहित है जिसे 'एकोहं बहुस्याम्' (मैं एक हूँ, बहुत हो जाऊँ) कहा गया है। एकांत से अनेकता की ओर बढ़ने की दिव्य इच्छा ही माया की भूमिका को जन्म देती है। यद्यपि ब्रह्म और माया के मूल स्वरूप में न शब्द हैं, न ध्वनि और न ही प्रकाश, क्योंकि समस्त तत्व 'शब्दशून्य' यानी मौन के धरातल पर ही अंकुरित होते हैं। ब्रह्म का मौन किसी रिक्तता का नाम नहीं, बल्कि वह 'पूर्णता का मौन' है।
शब्द का प्रादुर्भाव आकाश तत्त्व से होता है और वह माया की प्रथम अभिव्यक्ति है। माया वह शक्ति है जो स्पंदन (Vibration) और प्रकाश उत्पन्न करती है। यहाँ विचारणीय है कि ब्रह्म का मौन 'चैतन्य' है, जबकि माया का मौन मात्र एक 'क्षणिक निवृत्ति' या विश्राम है। मौन वह ऊर्जा है जो व्यक्ति के भीतर विचारों को दिशा देती है, यह सकारात्मक भी हो सकती है और नकारात्मक भी, जो पूर्णतः हमारे आंतरिक वातावरण पर निर्भर करती है।
मौन की अवस्था में शरीर शांत रहता है, किंतु मन सक्रिय होकर विचारों को 'सूक्ष्म शरीर' में ले जाता है। यहाँ विचारों की गति तीव्र और गहन हो जाती है क्योंकि बाहरी जगत से संपर्क कट जाता है। वास्तव में, मौन ही माया की वह गुप्त भाषा है, जिसके माध्यम से जीव अपने आप से संवाद करता है।
सृष्टि के चक्र को देखें तो शब्द शरीर का क्षेत्र है, मौन मन का, और इन दोनों से परे की अवस्था आत्मा का क्षेत्र है। जिस 'कारण शरीर' में आत्मा का निवास माना गया है, वह गहन अंधकार और मौन का धरातल है। यह विरोधाभास नहीं, बल्कि शाश्वत सत्य है कि संपूर्ण सृष्टि मौन और अंधकार से ही उत्पन्न होती है; जैसे सूर्य रात्रि के गर्भ से प्रकट होता है, वैसे ही प्रकाश अंधकार की कोख में पलता है और शब्द, मौन की गहराइयों से जन्म लेता है।
जन्म और मृत्यु दोनों ही मौन की घटनाएँ हैं। अतः मौन ही वह द्वार है जहाँ से हम माया के साम्राज्य में प्रवेश करते हैं और वहीं से पुनः ब्रह्म की पूर्णता की ओर लौट सकते हैं।
सादर,
केशव राम सिंघल