*ॐ*
*जय श्रीकृष्ण !*
*गीता अध्याय 5 - कर्म संन्यास योग - श्लोक 8 और 9*
5/8
*नैव किंचित्करोमीति युक्तो मन्येत तत्त्ववित् !*
*पश्यंश्रृण्वन्स्पृशंजिघ्रन्नश्नन्गच्छन्स्वपन्शवसन् !!*
5/9
*प्रलपंविसृजंगृन्हन्नुन्मिषन्निमिषन्नपि !*
*इंद्रियाणीद्रियार्थेषु वर्तन्त इति धारयन् !!*
*भावार्थ*
(श्रीकृष्ण अर्जुन से)
देखता हुआ, सुनता हुआ, स्पर्श करता हुआ, सूँघता हुआ, खाता हुआ, चलता हुआ, ग्रहण (स्वीकार) करता हुआ, बोलता हुआ, त्यागता हुआ, सोता हुआ, श्वास लेता हुआ, आँख खोलता हुआ और आँख मूँदता हुआ भी तत्व को जानने वाला संन्यासी ऐसा समझकर कि सभी इन्द्रियाँ अपने-अपने विषयों में संलग्न (प्रवृत) है, ऐसा मानता है कि वह स्वयं कुछ नहीं करता.
*प्रसंगवश*
उपर्युक्त दोनों श्लोकों में व्यक्ति की तेरह क्रियायों का उल्लेख किया गया है. व्यक्ति की ये तेरह क्रियाएं ज्ञानेन्द्रियों, कामेन्द्रियों, अंतःकरण, प्राण और उपप्राण द्वारा होती हैं. संन्यासी (सांख्ययोगी) शरीर, इन्द्रियों, अंतःकरण आदि के साथ अपना सम्बन्ध नहीं मानता, इसलिए ऐसा मानता है कि वह इन तेरह क्रियाओं का कर्ता नहीं है.
सादर,
केशव राम सिंघल
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