कथ्य-विशेष
अपने विचारों को अभिव्यक्त करने का प्रयास, चाहे वे आपके विचारों से भिन्न ही क्यों ना हों .... पाठकों की टिप्पणी का स्वागत है, पर भाषा शालीन हो, इसका निवेदन है .... - केशव राम सिंघल, अजमेर, भारत.
Saturday, April 25, 2026
मानव अस्तित्व के नौ आयाम - शरीर, मन और कामनाएँ
Saturday, April 18, 2026
पंचाग्नि विद्या
Saturday, April 11, 2026
अंतःकरण चतुष्टय और मैं
अंतःकरण चतुष्टय और मैं
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चित्र साभार NightCafe
मैं सूक्ष्म रूप में 'अक्षर' (विनाशरहित) जीवात्मा हूँ, जो स्वयं 'अव्यय' परमात्मा का ही अंश है। जीवात्मा 'अक्षर पुरुष' है और परमात्मा 'पुरुषोत्तम' हैं, जो कभी नष्ट नहीं होते। जीवात्मा जब तक प्रकृति के गुणों से बंधी है, वह 'अक्षर' होकर भी 'क्षर' के खेल का हिस्सा बनी रहती है। मेरे चारों ओर व्याप्त यह दृश्यमान संसार 'क्षर' (परिवर्तनशील) माया का ही प्रसार है। यह शरीर (क्षेत्र) नाशवान है और केवल एक साधन मात्र है, जबकि इसमें स्थित मैं (क्षेत्रज्ञ) अविनाशी हूँ।
तात्विक रूप से आत्मा और जीवात्मा एक ही हैं, परंतु शरीर के बंधन में होने के कारण इसे जीवात्मा कहा जाता है। नाशवान शरीर में अपरा (परिवर्तनशील) प्रकृति के रूप में शरीर-मन-बुद्धि-अहंकार। नाशवान शरीर के भीतर 'अपरा प्रकृति' के रूप में मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार विद्यमान हैं। गीता (7.4) के अनुसार पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, मन, बुद्धि और अहंकार—ये आठ प्रकार की अपरा प्रकृति हैं। मन के दो रूप - इंद्रिय मन (बाह्य मन) और सर्वेंद्रिय मन (आंतरिक-संकल्प मन)। इन्द्रिय मन अर्थात् 'इन्द्रिय-अधिष्ठाता मन', जो इन्द्रियों को संचालित करता है। सर्वेन्द्रिय मन अर्थात् 'संकल्प-विकल्पात्मक मन' जो सोचता है। मन दोहरी भूमिका निभाता है—एक जो बाह्य इंद्रियों से सूचना ग्रहण करता है (इंद्रिय मन) और दूसरा जो आंतरिक अनुभवों का समन्वय करता है।
मेरे चारों ओर भरा पूरा संसार (माया) है, जिनके साथ मेरा आदान-प्रदान स्थूल मन-बुद्धि से होता है। माया इतनी प्रबल और सूक्ष्म है कि वह प्रखर बुद्धि को भी भ्रमित कर 'अहंकार' को ही सत्य सिद्ध कर देती है। अहंकार स्वयं को महत्व देता है। अहंकार को माया नहीं दिखती। अहंकार स्वयं माया का ही एक अंग है, इसलिए वह अपने स्रोत को नहीं पहचान पाता। माया अति सूक्ष्म बुद्धि को भ्रमित कर देती है।
मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार - ये हमारे भीतर के चार उपकरण 'अंतःकरण चतुष्टय' कहलाते हैं। जैसे बाहर के कार्यों के लिए हमारे पास हाथ-पैर हैं, वैसे ही आतंरिक अनुभव और ज्ञान के लिए चार मानसिक शक्तियाँ काम करती हैं। मन का काम है संकल्प और विकल्प करना। "यह करूँ या वह करूँ?" यह द्वंद्व मन का स्वभाव है। बुद्धि का काम है निर्णय लेना। "यही सही है" यह निश्चयात्मक शक्ति बुद्धि है। चित्त हमारी चेतना का वह कोश है, जहाँ संस्कार और स्मृतियाँ (Memories) संचित रहती हैं। अहंकार में "मैं" का भाव रहता है अर्थात कर्तापन का बोध कि "मैं यह कर रहा हूँ" या "मैं सही हूँ"।
प्रारब्ध कर्म जीवात्मा से जुड़े होते हैं, शरीर से नहीं। प्रारब्ध कर्मों का संचय जीवात्मा (कारण शरीर) के साथ होता है, न कि भौतिक शरीर के साथ। इसी कारण मृत्यु के पश्चात भी संस्कार जीवात्मा के साथ गमन करते हैं। मृत्यु केवल स्थूल शरीर की होती है, जबकि सूक्ष्म और कारण शरीर जीवात्मा के साथ अगले पड़ाव की यात्रा करते हैं।
आइए मन और चित्त के बीच मुख्य अंतर को समझें। मन और चित्त दोनों एक-दूसरे से गहरे जुड़े हैं, फिर भी सूक्ष्म स्तर पर इन दोनों में अंतर है। मन का मुख्य कार्य इन्द्रियों के माध्यम से आने वाली सूचनाओं पर प्रतिक्रिया करना है, जबकि चित्त भूतकाल के अनुभवों, कर्मों और संस्कारों का भण्डार गृह है। मन का स्वभाव अत्यंत चंचल है। यह क्षण-क्षण में बदलता रहता है, संकल्प-विकल्प में अटका रहता है। चित्त का स्वभाव गहरा और स्थिर होता है। इसमें दबी हुई इच्छाएँ और पुराने संस्कार बीज रूप में रहते हैं, जो समय आने पर याद आ जाते हैं। मन की भूमिका एक संग्रहकर्ता की तरह है, जो बाहर से विषय-वस्तु चुनता है। चित्त भण्डार-गृह है, जहाँ पुरानी फाइलें (यादें) सुरक्षित रहती हैं। मन की प्रक्रिया - जब कोई कुछ देखता है तो उसका मन कहता है - यह क्या है? चित्त उसी समय पुरानी स्मृति से मिलान कर बताता है कि यह तो मैंने पहले भी देखा था।
इसे हम एक उदाहरण से समझ सकते हैं। कल्पना कीजिए कि आप एक सुंदर दृश्य देख रहे हैं। आपका मन उस दृश्य को देखकर चकित होता है और विचार करता है कि यहाँ रुकूँ या आगे बढ़ूँ? (संकल्प-विकल्प)। उसी समय आपका चित्त उस दृश्य से जुड़ी आपकी पुरानी स्मृतियों को जाग्रत करता है। यदि आपने पहले कभी ऐसा दृश्य देखा था, तो उस समय का सुख या दुःख चित्त से ही उभर कर आएगा। आपकी बुद्धि यह निर्णय लेती है कि यह दृश्य वास्तव में सुंदर है या नहीं। क्या इसे देखा जाए या यहाँ से चला जाए? उसी समय आपका अहंकार यह अनुभव कर सोचता है कि "मैं" इस सुंदरता का आनंद ले रहा हूँ।
संक्षेप में 'मन' वह है जो अभी सक्रिय है और लहरों की तरह उठ रहा है, जबकि 'चित्त' वह गहरा सागर है जिसमें पूर्व जन्मों और इस जन्म के समस्त कर्म-संस्कार समाहित हैं।
सादर,
केशव राम सिंघल
Sunday, January 11, 2026
प्रसंगवश - कर्म (KARMA) - वेदांत और गीता का सार
प्रसंगवश -
कर्म (KARMA) - वेदांत और गीता का सार
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प्रतीकात्मक चित्र साभार NightCafe
अध्यात्म में जब हम अध्ययन करते है तो पाते हैं कि गीता और वेदांत के अनुसार, कर्मों का वर्गीकरण अलग-अलग आधारों पर किया गया है। वेदांत के अनुसार तीन तरह के कर्म बताए जाते हैं - क्रियमाण कर्म, संचित कर्म और प्रारब्ध कर्म।
* संचित कर्म (Sanchita Karma) - यह हमारे अनंत जन्मों के कर्मों का वह विशाल भंडार है जो अभी "गोदाम" में जमा है। यह उस तर्कश (Quiver) की तरह है जिसमें बहुत सारे बाण रखे हैं।
* प्रारब्ध कर्म (Prarabdha Karma) - संचित कर्मों का वह हिस्सा जो इस वर्तमान जीवन में फल देने के लिए "पक" चुका है। यह वह बाण है जो धनुष से छूट चुका है; इसे अब वापस नहीं लिया जा सकता, इसका फल भोगना ही पड़ता है। साधना और ईश्वर कृपा से प्रारब्ध के प्रभाव को सहने की शक्ति मिलती है, भले ही घटना अपरिवर्तनीय हो।
* क्रियमाण कर्म (Kriyaman Karma) - यह वह कर्म है जो हम अभी वर्तमान में कर रहे हैं। यह वह बाण है जिसे हमने अभी धनुष पर चढ़ाया है। हमारे पास इसे चलाने की दिशा बदलने की स्वतंत्रता (Free will) है। यही कर्म भविष्य में 'संचित' बन जाते हैं।
कर्म के बारे में सकाम और निष्काम कर्म की बात की जाती है। भगवान कृष्ण ने गीता (अध्याय 4, श्लोक 17) में कर्म की गति को समझाने के लिए तीन तरह के कर्म का ज्ञान दिया।
* कर्म (Karma) - शास्त्र सम्मत और उचित कार्य।
* विकर्म (Vikarma) - निषिद्ध या गलत कार्य (जो नहीं करने चाहिए)।
* अकर्म (Akarma) - फल की इच्छा के बिना किया गया कर्म (निष्काम भाव से किया कर्म), जो मनुष्य को कर्मों के बंधन से मुक्त कर देता है।
संक्षेप में, सकाम और निष्काम, यह कर्म करने की नियत (Intention) बताते हैं। संचित, प्रारब्ध और क्रियमाण: यह कर्मों के समय और प्रभाव (Accumulation and Effect) को दर्शाते हैं।
गीता में कर्मों का वर्गीकरण मुख्य रूप से दो आधारों पर किया गया है - एक जो कर्मों की प्रकृति (Nature) बताते हैं और दूसरे जो कर्म करने वाले के गुण (Gunas) पर आधारित हैं।
1. कर्म, विकर्म और अकर्म (गीता अध्याय 4)
भगवान कृष्ण ने अध्याय 4 के श्लोक 17 और 18 में कर्म की सूक्ष्म गति को समझाया है। यह वर्गीकरण सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है -
कर्मणो ह्यपि बोद्धव्यं बोद्धव्यं च विकर्मणः।
अकर्मणश्च बोद्धव्यं गहना कर्मणो गतिः॥ (4.17)
भावार्थ - कर्म का स्वरूप भी समझना चाहिए, 'विकर्म' (गलत कर्म) का स्वरूप भी समझना चाहिए और 'अकर्म' का स्वरूप भी समझना चाहिए; क्योंकि कर्म की गति बहुत गहन (रहस्यमयी) है।
* कर्म - शास्त्र सम्मत या कर्तव्य कर्म।
* विकर्म - जो कर्म शास्त्र के विरुद्ध हों या पाप कर्म हों।
* अकर्म - फल की इच्छा के बिना किया गया कर्म, जो मनुष्य को बंधन में नहीं डालता।
2. सकाम और निष्काम कर्म (अध्याय 2)
गीता अध्याय 2 का श्लोक 47 निष्काम कर्म का आधार है -
कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि॥ (2.47)
भावार्थ - तेरा अधिकार केवल कर्म करने में है, उसके फलों में कभी नहीं। इसलिए तू कर्मों के फल का हेतु मत बन और तेरी आसक्ति कर्म न करने (अकर्मण्यता) में भी न हो।
यहाँ यह स्पष्ट करना जरूरी है कि 'अकर्म' (निष्काम कर्म) और अकर्मण्यता (काम न करना या आलस्य) दो अलग चीजें हैं। अक्सर लोग अकर्म का अर्थ 'कुछ न करना' समझ लेते हैं, जो गलत है।
3. गुणों के आधार पर कर्म (गीता अध्याय 18)
गीता अध्याय 18 में भगवान श्रीकृष्ण ने सत्त्व, रज और तम गुणों के आधार पर कर्म के तीन प्रकार बताए हैं -
* सात्त्विक कर्म (18.23) - जो कर्म नियत है, आसक्ति रहित है और राग-द्वेष के बिना, फल की इच्छा न रखने वाले व्यक्ति द्वारा किया गया है।
* राजस कर्म (18.24) - जो कर्म बहुत परिश्रम के साथ, फल की इच्छा रखने वाले या अहंकार से युक्त पुरुष द्वारा किया जाता है।
* तामस कर्म (18.25) - जो कर्म परिणाम, हानि, हिंसा और अपनी सामर्थ्य का विचार किए बिना केवल मोहवश किया जाता है।
निष्कर्ष (Conclusion)
उपरोक्त विवेचन से यह स्पष्ट है कि हमारा भूतकाल 'प्रारब्ध' के रूप में सामने खड़ा है, जिसे धैर्य और साधना से स्वीकार करना चाहिए। लेकिन हमारा भविष्य पूरी तरह हमारे वर्तमान यानी 'क्रियमाण कर्म' पर निर्भर है। यदि हम अपने कर्मों को 'अकर्म' (निष्काम भाव) और 'सात्त्विक' गुणों से जोड़ लें, तो न केवल हम सुखी जीवन जी सकते हैं, बल्कि जन्म-मरण के इस कर्म-चक्र से मुक्त भी हो सकते हैं। अतः हाथ में लिए बाण (वर्तमान कर्म) को सही दिशा देना ही मनुष्य का वास्तविक पुरुषार्थ है।
संचित - आपका बैंक बैलेंस (पुराना जमा)।
प्रारब्ध - वर्तमान में मिलने वाली किश्त (EMI)।
क्रियमाण - वह नया निवेश जो आप आज कर रहे हैं।
सादर,
केशव राम सिंघल
Sunday, December 21, 2025
ॐ की महत्ता
Monday, December 1, 2025
गायत्री मंत्र - अर्थ, महत्त्व और जीवन संदेश
गायत्री मंत्र - अर्थ, महत्त्व और जीवन संदेश
चित्र साभार NightCafe
गायत्री मंत्र वेदों का महामंत्र है—प्रकाश, ज्ञान और सद्बुद्धि की ओर ले जाने वाला पथदर्शक। यह मंत्र न केवल आध्यात्मिक उन्नति का साधन है, बल्कि जीवन के हर क्षेत्र में सकारात्मकता, स्पष्टता और संतुलन प्रदान करता है।
गायत्री मंत्र
ॐ भूर्भुवः स्वः
तत्सवितुर्वरेण्यं
भर्गो देवस्य धीमहि
धियो यो नः प्रचोदयात्।
Om Bhur Buvah Swah
Tatsavitur Varenyam
Bhargo Devasya Dheemahi
Dhiyo Yo Nah Prachodayat.
भावार्थ
हम उस परमात्मा का ध्यान करें—जो प्राणस्वरूप है, दुःखों का नाश करने वाला है, सुख और शांति का दाता है, श्रेष्ठ और तेजस्वी है, तथा पापों को नष्ट करने वाला है। हे प्रभु! आप हमारी बुद्धि को सन्मार्ग की ओर प्रेरित करें और हमारे अंतःकरण को प्रकाशमान करें।
मंत्र के पदों का सरल जीवनोपयोगी अर्थ
ॐ (अ + उ + म्) –
अ = आत्मानंद में रमण करना
उ = उन्नति की ओर बढ़ना
म् = महानता की ओर अग्रसर होना
अर्थात्: आत्मानंद से प्रेरित होकर उन्नति और महानता की ओर बढ़ते रहना।
भूः – हम शरीर नहीं, आत्मा हैं—प्राण हैं।
भुवः – अपने कर्मों और कर्तव्यों को सद्कर्मों से पूरा करना।
स्वः – मन को भीतर स्थिर कर आत्म-नियंत्रण विकसित करना।
तत् – जीवन और मृत्यु की अनिवार्यता को समझना; वास्तविकता को स्वीकारना।
सवितुः – सूर्य के समान तेजस्वी, उज्ज्वल और ऊर्जावान बनना।
वरेण्यं – अशुभ चिंतन को त्यागकर श्रेष्ठ चिंतन को अपनाना।
भर्गः – पापों से बचते हुए निष्पाप जीवन की ओर अग्रसर होना।
देवस्य – अशुद्ध दृष्टिकोण से बचकर शुद्ध, दिव्य विचारों को अपनाना।
धीमहि – सद्गुणों को अपने भीतर धारण करना।
धियो – विवेक का महत्त्व समझकर विवेकवान बनना।
यो नः – आत्मसंयम और परमार्थ के दिव्य मार्ग को अपनाना।
प्रचोदयात् – हे भगवान! हमारी बुद्धि को सद्मार्ग पर प्रेरित करें।
गायत्री मंत्र केवल जप नहीं—जीवन का मार्गदर्शन है। यह सिखाता है कि मन शुद्ध हो, विचार श्रेष्ठ हों, कर्म नैतिक हों और जीवन प्रकाशमय।
सादर,
केशव राम सिंघल
(संकलित)
Wednesday, September 17, 2025
अध्यात्म और विज्ञान – चेतना का शाश्वत सत्य
अध्यात्म और विज्ञान – चेतना का शाश्वत सत्य
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प्रतीकात्मक चित्र साभार NightCafe
अध्यात्म कहता है – आत्मा न तो जन्म लेता है और न ही कभी मरता है। आत्मा शाश्वत, अविनाशी और सनातन है। (गीता, अध्याय 2 – श्लोक 19, 20)
विज्ञान भी यही कहता है – ऊर्जा कभी समाप्त नहीं होती, वह केवल अपना रूप बदलती है।
स्पष्ट है कि अध्यात्म और विज्ञान दोनों ही एक ही सत्य की ओर संकेत करते हैं। आत्मा कहें या ऊर्जा – यही तो चेतना है। यही हमारे अस्तित्व का मूल स्वरूप है।
आप अकेले नहीं हैं, मैं अकेला नहीं हूँ। हम सब इस अनंत यात्रा का हिस्सा हैं। हम केवल रूप बदलते रहते हैं, जैसे एक लहर समुद्र से कभी अलग नहीं होती, केवल अपना आकार बदलकर आगे बढ़ती रहती है।
जब आप और मैं इस भौतिक दुनिया से विदा होंगे, तब भी हम पूरी तरह समाप्त नहीं होंगे। केवल शरीर निष्क्रिय होगा, परंतु हमारे शब्द, हमारे कर्म, हमारे विचार और यहाँ तक कि हमारी आनुवंशिक जानकारी (डीएनए) – हमारी संतान, समाज और आने वाले कल में जीवित रहेंगे।
हम सब शाश्वत चेतना से निरंतर जीवित रहते हैं। हम अपने पूर्वजों का विस्तार हैं और अपनी संतान के भविष्य के बीज हैं।
ब्रह्माण्ड के लिए हम कभी समाप्त नहीं होते। हम केवल एक यात्रा पर हैं – जहाँ शरीर बदलते हैं, रिश्ते बदलते हैं, पर हमारी असली पहचान – हमारी चेतना – शाश्वत बनी रहती है।
यही विज्ञान का अद्भुत चमत्कार है और यही अध्यात्म का सनातन सत्य है।
सादर,
केशव राम सिंघल
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