कामना कर्म-श्रृंखला का बंधन है
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मन के वातावरण के अनुसार कामना स्वतः फूटती रहती है। कामना का स्वरूप बुद्धि का रूप और कर्म की दिशा तय करता है। कामना कर्म श्रृंखला का बंधन है। यह विचार बहुत गहरा है। इसमें मन से कामना, कामना से बुद्धि, बुद्धि से कर्म और कर्म से बंधन की एक मनोवैज्ञानिक और दार्शनिक श्रृंखला दिखाई देती है। इसे हम इस प्रकार समझ सकते हैं।
मन का वातावरण जैसा होता है, वैसी ही कामनाएँ सहज रूप से उत्पन्न होती हैं। कामना जिस प्रकार की होती है, वह बुद्धि को उसी दिशा में सोचने और निर्णय लेने के लिए प्रभावित करती है। फिर बुद्धि के अनुसार कर्म की दिशा निर्धारित होती है। कर्म बार-बार दोहराया जाए तो वह आदत, संस्कार और अंततः एक प्रकार के बंधन का रूप ले सकता है। इसलिए यह कहना —“कामना कर्म-श्रृंखला का बंधन है”—पूरे विचार का सार बन जाती है।
इसे एक सूत्र में इस प्रकार व्यक्त किया जा सकता है - मन का वातावरण → कामना → बुद्धि का रूप → कर्म की दिशा → कर्म की पुनरावृत्ति → बंधन
और यह मार्ग भी विचारणीय है - सजग मन → शुद्ध कामना → विवेकपूर्ण बुद्धि → सही कर्म → संस्कारों का परिष्कार → आंतरिक स्वतंत्रता।
यह विचार भारतीय दर्शन के मन, बुद्धि, कामना, कर्म और बंधन संबंधी चिंतन से भी गहराई से जुड़ता है।
सादर,
केशव राम सिंघल