अपने विचारों को अभिव्यक्त करने का प्रयास, चाहे वे आपके विचारों से भिन्न ही क्यों ना हों .... पाठकों की टिप्पणी का स्वागत है, पर भाषा शालीन हो, इसका निवेदन है .... - केशव राम सिंघल, अजमेर, भारत.
Sunday, July 9, 2023
गीता सार - ०१
Tuesday, April 25, 2023
मन की शान्ति
मन की शान्ति
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हमारा मन बहुत ही गतिशील और चंचल है और यही हमारी अशांति का कारण बन जाता है। कई बार हमारे आस-पास और हमारे अन्दर भी एक घमासान युद्ध चलने लगता है, कई तरह के विचार जन्म लेते हैं और हम उलझ जाते हैं। यह हमारा दुर्भाग्य ही है कि हमें काम, क्रोध, मद, लोभ, अज्ञानता, चाटुकारिता, मोह से इतना लगाव हो जाता है कि हम अपने इन शत्रुओं के अधीन हो जाते हैं और उचित निर्णय नहीं ले पाते हैं। हमारी ग़लत सोच ही हमारे जीवन में एक मात्र समस्या है। मोह के कारण हम उचित और न्यायसंगत निर्णय लेने से भटक जाते हैं। हमारा मन स्थिर नहीं रहता, यह बदलता रहता है।
हमारा वर्तमान भौतिक अस्तित्व (रूप) अनस्तित्व के दायरे में है। हमें अनस्तित्व से घबराना नहीं चाहिए। वास्तव में हमारा अस्तित्व सनातन है, शाश्वत है। हम भौतिक शरीर में डाल दिए गए हैं। हमारा यह भौतिक शरीर (व अन्य भौतिक पदार्थ) असत् है। असत् जो शाश्वत नहीं है, जिसका अस्तित्व स्थाई नहीं है। परिवर्तनशील शरीर का स्थायित्व नहीं है। शरीर और मन बदलता रहता है, पर आत्मा स्थाई रहता है। आत्मा शाश्वत है। आत्मा सत् है।
*इंद्रियाणान् .....* (गीता 2/67) में बताया गया है - "जिस प्रकार पानी में तैरती नाव को ते़ज (प्रचंड) वायु (या लहर) उसे दूर बहा ले जाती है, उसी प्रकार चंचल इंद्रियों के साथ मन सदा लगा रहता है और यह व्यक्ति की बुद्धि को दूर बहा ले जाती है अर्थात व्यक्ति अपने मन को स्थिर नहीं रख पाता है।"
जिस व्यक्ति की इंद्रियाँ इंद्रिय-विषयों से विरत रहकर उसके वश में रहती हैं, उसकी बुद्धि स्थिर है। स्थिर बुद्धि का व्यक्ति भोगों को नही चाहते हुए शान्ति में स्थिर रहता है। जो व्यक्ति इंद्रियतृप्ति की भौतिक इच्छाओं का त्याग कर देता है और जो इच्छा-रहित, ममता-रहित और अहंकार-शून्य रहता है, वह पूर्ण (वास्तविक) शान्ति प्राप्त करता है। यही वह आध्यात्मिक स्थिति है जिसे प्राप्त कर व्यक्ति कभी मोहित नहीं होता और इस प्रकार जीवन के अन्तिम समय में वह ब्रह्म-आनंद प्राप्त करता है।
मन में ऐसा भाव आए कि "मैं किसी को बुरा ना समझूँ, किसी का बुरा ना चाहूँ और किसी का बुरा ना करूँ" तो समझो कि कर्मयोग की शुरुआत हो चुकी है। कर्मयोग का अर्थ है चित्त की स्थिरता, संयमन, इंद्रियों का निग्रह करते हुए तथा परमात्मा (श्रीभगवान) के साथ सम्बन्ध बनाते हुए अपना कर्म करना। पर यह कैसे हो?
इस बारे में भगवान श्रीकृष्ण (गीता 3/42) कहते हैं - इंद्रियों को श्रेष्ठ कहा जाता है। इंद्रियों से श्रेष्ठ मन है। मन से भी श्रेष्ठ बुद्धि है और आत्मा बुद्धि से भी श्रेष्ठ है। इस प्रकार बुद्धि से श्रेष्ठ आत्मा को जानकर बुद्धि के द्वारा मन को वश में कर। इस प्रकार मन को बुद्धि के द्वारा संयमित और स्थिर किया जा सकता है।
मन में जितनी भी बातें आती हैं, वे प्रायः भूतकाल या भविष्यकाल से सम्बंधित होती हैं अर्थात् जो गया या जो होने वाला है, पर यह सब अभी (वर्तमान में) नहीं होता। हमें शरीर, इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि, प्राणादि से अपने को ऊँचा उठाने का प्रयास करना चाहिए। जितना हो सके जड़ वस्तुओं से सम्बन्ध त्यागना चाहिए। हमें यह समझ लेना चाहिए कि असत् के द्वारा सत् की प्राप्ति नहीं होती, वरन असत् के त्याग से सत् की प्राप्ति होती है। पदार्थ, क्रिया और संकल्पों में आसक्त ना हो, ऐसा प्रयत्न करना चाहिए।
दो बातें महत्वपूर्ण हैं - पहली, चित्त स्वरूप में स्थित हो जाए और दूसरी, पदार्थों से निःस्पृहः हो जाए। मन में किसी वस्तु, व्यक्ति, परिस्थिति, काल आदि का चिंतन न हो और कोई काम, वासना, आशा आदि न हो। मन वस्तुतः बहुत चंचल होता है, पर हमें यह सीखना चाहिए कि अंतर्मन को वश में करने की जरूरत है। मन की शान्ति से बढ़कर संसार में कोई भी संपत्ति नहीं है।
सादर,
केशव राम सिंघल
Sunday, October 23, 2022
संकलित जानकारी
संकलित जानकारी
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सात पदार्थ - (1) द्रव्य (2) गुण (3) कर्म (4) सामान्य (5) विशेष (6) समवाय (7) अश्राव
नौ प्रकार के द्रव्य पदार्थ - (1) पृथ्वी (2) जल (3) तेज, अग्नि (4) वायु (5) आकाश (6) काल (7) दिग् (8) आत्मा (9) मन
गुणवाला होना द्रव्य का लक्षण है।
वायु के नौ गुण - (1) स्पर्श (2) संख्या (3) परिमाण (4) पृथक्त्व (5) संयोग (6) विभाग (7) परत्व (8) अपरत्व (9) वेग
तेज (अग्नि) के ग्यारह गुण - (1) रूप (2) स्पर्श (3) संख्या (4) परिमाण (5) पृथक्त्व (6) संयोग (7) विभाग (8) परत्व (9) अपरत्व (10) द्रवत्व (11) वेग
जल के चौदह गुण - (1) रूप (2) रस (3) गंध (4) स्पर्श (5) परिमाण (6) संयोग (7) विभाग (8) पृथकत्व (9) परत्व (10) अपरत्व (11) गुरुत्व (12) द्रवत्व (13) स्नेह (14) वेग
पृथ्वी के चौदह गुण - (1) रूप (2) रस (3) गंध (4) स्पर्श (5) परिमाण (6) संयोग (7) विभाग (8) पृथकत्व (9) परत्व (10) अपरत्व (11) गुरुत्व (12) द्रवत्व (13) संख्या (14) वेग
जीवात्मा के चौदह गुण - (1) संख्या (2) परिमाण (3) पृथकत्व (4) संयोग (5) विभाग (6) बुद्धि (7) सुख (8) दुःख (9) इच्छा (10) द्वेष (11) प्रयत्न (12) धर्म (13) अधर्म (14) भावना
दिग् और काल के पाँच गुण - (1) संख्या (2) परिमाण (3) संयोग (4) विभाग (5) पृथकत्व
आकाश के छह गुण - (1) संख्या (2) परिमाण (3) पृथकत्व (4) संयोग (5) विभाग (6) शब्द
ईश्वर के आठ गुण - (1) संख्या (2) परिमाण (3) पृथकत्व (4) संयोग (5) विभाग (6) बुद्धि (7) इच्छा (8) प्रयत्न
मन के आठ गुण - (1) संख्या (2) परिमाण (3) पृथकत्व (4) संयोग (5) विभाग (6) परत्व (7) अपरत्व (8) वेग
पाँच सूत्र - जिन पर ध्यान देने की जरुरत है - (1) शिक्षा (2) संस्कार (3) संगति (4) एकता (5) व्यक्तिगत पहचान
संकलनकर्ता - केशव राम सिंघल
साभार - विभिन्न स्रोत
Friday, February 4, 2022
#086 - गीता अध्ययन एक प्रयास
गीता अध्ययन एक प्रयास
*ॐ*
*जय श्रीकृष्ण*
*गीता अध्याय 8 -
अक्षरब्रह्मयोग*
8/18
अव्यक्ताद्व्यक्तयः
सर्वा प्रभवन्त्यहरागमे।
रात्र्यागमे प्रलीयन्ते
तत्रैवाव्यक्तसंज्ञके।।
*भावार्थ*
भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन
से कहते हैं -
ब्रह्मा के दिन के आरंभकाल (शुरू) में ब्रह्मा के सूक्ष्म शरीर (अव्यक्त) से सम्पूर्ण जीव (शरीर) पैदा होते हैं और ब्रह्मा की रात्रि के आरम्भकाल (शुरू) में ही सम्पूर्ण जीव (शरीर) लीन हो जाते हैं।
*प्रसंगवश*
जब सभी जीव ब्रह्मा के सूक्ष्म शरीर में लीन होते हैं, तब वे जन्म-मृत्यु के चक्र से छूट नहीं पाते हैं, बल्कि जन्म-मृत्यु के चक्र में फंसे रहते हैं।
सादर,
केशव राम सिंघल
Thursday, July 1, 2021
#085 - गीता अध्ययन एक प्रयास
गीता
अध्ययन एक प्रयास
*ॐ*
*जय श्रीकृष्ण*
*गीता अध्याय
8 - अक्षरब्रह्मयोग*
8/17
सहस्रयुगपर्यन्तमहर्यद्ब्रह्मणो
विदुः।
रात्रिं
युगसहस्रान्तां तेऽहोरात्रविदो जनाः।।
*भावार्थ*
भगवान् श्रीकृष्ण
अर्जुन से कहते हैं -
जो व्यक्ति
ब्रह्माजी के एक हजार चतुर्युग वाले एक दिन और एक हजार चतुर्युग वाली एक रात्रि को
जानता है, वह व्यक्ति ब्रह्माजी के दिन और रात (अर्थात देवता-काल तत्व) को जानते हैं।
*प्रसंगवश*
हमें यह
समझना चाहिए कि हमारे समय का परिमाण देवताओं के समय के परिमाण से अलग है। देवताओं के
समय का परिमाण हमारे समय के परिमाण से लगभग तीन सौ साठ गुना माना जाता है। हमारा एक
वर्ष देवताओं का एक दिन-रात के बराबर होता है। इसे हम इस प्रकार कह सकते हैं –
हमारा एक
वर्ष = देवताओं का एक दिन-रात
हमारे तीस
वर्ष = देवताओं का एक महीना
हमारे
360 वर्ष = देवताओं का एक वर्ष = 1 दिव्य वर्ष
कलियुग
= 1,200 दिव्य वर्ष = 4,32,000 वर्ष
द्वापरयुग
= 2,400 दिव्य वर्ष = 8,64,000 वर्ष
त्रेतायुग
= 3,600 दिव्य वर्ष = 12,96,000 वर्ष
सतयुग =
4,800 दिव्य वर्ष = 17,28,000 वर्ष
एक दिव्य
युग = कलियुग + द्वापरयुग + त्रेतायुग + सतयुग
हमारे
43,20,000 वर्ष = 12,000 दिव्य वर्ष = एक दिव्य युग = एक महायुग = एक चतुर्युग (दिव्य युग को महायुग
और चतुर्युग भी कहा जाता है। )
1 दिव्य
युग = ब्रह्माजी का एक दिन
ब्रह्मा
जी की रात्रि अवधि भी इतनी होती है।
ब्रह्माजी
का दिन 'कल्प' या 'सर्ग' कहलाता है।
ब्रह्माजी
की रात्रि 'प्रलय' कहलाती है।
उपर्युक्त
काल-गणना से हमें यह ज्ञान होता है कि मनुष्य जीवन अवधि बहुत ही कम है।
सादर,
केशव राम
सिंघल
Sunday, October 11, 2020
सार-संक्षेप - ॐ रहस्य
*सार-संक्षेप*
*ॐ प्रार्थना*
ओङ्कार
बिंदु संयुक्तं
नित्य
ध्यायन्ति योगिनः
कामदं
मोक्षदं चैव
ओङ्काराय
नमो नमः !!
(भावार्थ - योगीजन अनुस्वार से युक्त ओङ्कार का सदा ध्यान करते हैं। यह ओङ्कार सभी इच्छाओं की पूर्ति करने वाला और मोक्ष दाता है। हम सभी इन ओङ्कार के प्रति नमस्कार करते हैं।)
*ॐ रहस्य*
ॐ की महिमा अपार है। ॐ की ध्वनि का निर्माण 'अ', 'उ' और 'म' इन तीन अक्षरों से हुआ है।
'अ' अर्थात यह भूलोक और स्थूल दृश्य जगत।
'उ' अर्थात सूक्ष्म जगत।
'म' अर्थात सुपुप्ति से सम्बन्ध रखने वाले अदृश्य, अगोचर अथवा जाग्रत अवस्था में जिसका ज्ञान बुद्धि से नहीं हो सकता और जहां बुद्धि की पहुँच नहीं है और जो मन, बुद्धि और वाणी से परे है।
ॐ सर्व का ही प्रतिरूप है।
ॐ ही प्राण, बुद्धि और विवेक का आधार स्तम्भ है। आदि से अंत तक सभी ॐ के अंतर्गत हैं। बाइबिल में कहा गया है की सृष्टि की आदि में शब्द था, यह शब्द ब्रह्म के साथ ही था और यह शब्द ही ब्रह्म भी था। (In the beginning there was a word, the word was with God and the word was God.) अपनी प्रार्थना के अंत में ईसाई 'अमेन' (Amen) शब्द का प्रयोग करते हैं। मुसलमान अपनी प्रार्थना (नमाज) में 'आमीन' (Aameen) कहा करते हैं। ये 'अमीन' और 'आमीन' भी ॐ के रूपांतर मात्र हैं।
ॐ सभी ध्वनियों की जीवनी और जीवन सार है।
ॐ जीवन है।
ॐ प्राण है।
ॐ श्वास है।
ॐ सभी मन्त्रों का मूलमंत्र है।
ॐ सार्वभौमिक मन्त्र है।
ॐ गीता का एकेश्वर है।
ॐ वेदों का प्रणव है।
ॐ ब्रह्म का प्रतीक है।
ॐ गुरुनानक का सतनाम एक ओंकार है।
ॐ बाइबिल का शब्द है।
ॐ नमाज का आमीन है।
ॐ शक्ति का रहस्यमय शब्द है।
ॐ विश्व की प्रत्येक वस्तु का आदि स्रोत है।
ॐ सहायक और अमरता का प्रदायक है।
ॐ सब कुछ है।
ॐ ब्रह्माण्ड की ध्वनि है।
ॐ का निरंतर जप, संगीत और ध्यान वैदांतिक साधना का आवश्यक भाग है। तुरीयावस्था, ब्रह्म, आत्मा और ॐ एक ही हैं। ॐ समस्त वेदों के सार का प्रतीक है। ॐ अद्भुत शक्तियों का खजाना है। वेदांत पथ पर चलने वालों को श्रद्धा और भाव के साथ निरंतर ॐ का जप करना चाहिए।
बार-बार ॐ का यश गाओ। अपने हृदय और आत्मा को ॐ के संगीत की और सदा लगाए रखो। जीवन की समस्त क्रियाएं पवित्र प्रणव की पूजा के रूप में करो। सदा ॐ में विचरो। ॐ को अपने निवास स्थान का केंद्र बिंदु बना लो। प्रत्येक श्वास के साथ ॐ का उच्चारण करो। ऐसा करो कि ॐ की मस्ती छाई रहे। ॐ के जागरण-शील साम्राज्य में इस मिथ्या संसार के स्वप्न को बिलकुल भूल जाओ। ॐ के दिव्य आनंद में संसार के दुःख-दर्दों को पी जाओ। ॐ ही दिव्य, शाश्वत आनंद और शान्ति का परम धाम है।
जिस समय ॐ का ध्यान करने बैठो, कम से कम पाँच मिनट तक सुदीर्घ ॐ की प्रणव ध्वनि अवश्य करें। इससे मन का विक्षेप नष्ट होगा और चित्त भी शांत और एकाग्र हो जाएगा। संसार की सभी मलिन वासनाएं हैट जाएँगी और निर्मल हृदयाकाश में आत्मानुभूति के परम पवित्र सुन्दर भाव उदय होंगे।
सादर,
केशव राम सिंघल (सार-संक्षेप सम्पादन)
(साभार - फरवरी 1940 में प्रकाशित - सात्विक जीवन ग्रंथमाला - ॐ प्रणव रहस्य, लेखक - स्वामी शिवानंद सरस्वती, प्रकाशक - सात्विक जीवन कार्यालय, बनारस)
Sunday, December 8, 2019
#084 - *गीता अध्ययन एक प्रयास*
*ॐ*
*जय श्रीकृष्ण !*
*मन और बुद्धि*
भगवान् श्रीकृष्ण अर्जुन को उपदेश देते हुए गीता अध्याय 3 श्लोक 42 में स्पष्ट कहते हैं कि मन से भी अलग बुद्धि है। जैसा कि आप सभी जानते हैं कि मन-बुद्धि अंतःकरण हैं। मन अच्छा-बुरा बहुत कुछ सोचता है, पर मन बुरा सोचे नहीं, यह तो और भी अच्छा होगा।
हरेक का जीवन एक व्यष्टि परिवाररूप है, जिसमें निम्न सोलह लोग रहते हैं - पहला, परम पिता अर्थात् परमात्मा - चाहे जड़ हो या चेतन हरेक कण में परमात्मा है; दूसरा, आत्मा अर्थात् चेतन अंश; तीसरा, माया अर्थात् यह संसार; चौथा, पाँचमहाभूत (अर्थात् जल, वायु, तेज, पृथ्वी और आकाश) से बना यह स्थूल शरीर; पाँचवाँ, बुद्धि; छठा, मन; सात से ग्यारह - पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ - श्रोत (कान), त्वचा, नेत्र, रसना (जीभ), और घ्राण (नासिका); बारह से सोलह - पाँच कमेन्द्रियाँ - वाक् (मूँह), पाणि (हाथ), पाद (पैर), उपस्थ और पायु। पाँच महाभूत से बना यह स्थूल शरीर 'विषय' है, इन्द्रियाँ 'बहिःकरण' हैं और मन-बुद्धि 'अंतःकरण' है।
मन और बुद्धि साथ-साथ रहते हैं, वे एक तरह से पत्नी और पति की तरह होते हैं। उनमें परस्पर युद्ध (विवाद) होता रहता है, पर वे अलग होकर भी नहीं रह सकते। एक तरह से देखा जाए तो कौरव और पाण्डव भी यही मन और बुद्धि हैं, जिनके बीच का युद्ध महाभारत है। हमारे अंतःकरण में चलने वाले इस युद्ध के रथ में मन घोड़े हैं और बुद्धि रस्सी (लगाम) है। घोड़े और लगाम सदा तनाव में रहते हैं। लगाम में तनाव होने से घोड़े भी तनाव में रहते हैं पर रहते हैं नियंत्रित और इसी कारण लक्ष्य की ओर बढ़ते हैं। लगाम को ढीला छोड़ देने से घोड़े अनियंत्रित होकर लक्ष्य से भटक सकते हैं।
मन जब कुछ कहता है, तब उसे सबसे पहले सुनने वाला बुद्धि होती है। बुद्धि के निर्णय के बिना मन इन्द्रियों से कुछ भी करवा नहीं सकता। मन स्वयं कोई निर्णय नहीं लेता, मन भाव-ताव करता है क्योंकि वह वैश्य है। बुद्धि क्षत्रिय है, जो साहसी है। मन के सभी निर्णय बुद्धि करती है या फिर मन इन्द्रियों के द्वारा बुद्धि की सहमति से करवाती है या फिर बुद्धि से छिपा कर करवाती है। जब कोई व्यक्ति कुछ गलत करता है या बुरा बोलता है, तब वह मन का दोष नहीं होता, बल्कि बुद्धि की कायरता, असावधानी या गलत निर्णय है।
बुद्धि जो मन को अनुशासित (अर्थात् नियंत्रित) करने में असफल है तो कहा जा सकता है कि व्यक्ति असावधान है। मन की वृतियों को रोकना संभव नहीं है। मन जब दुःखी होता है, तब वह शिकायत करने लगता है। बुद्धि के सावधान रहने की जरुरत है। यदि बुद्धि सावधान नहीं है तो मन अनियंत्रित होकर वाणी का दुरूपयोग करवाने लगता है या फिर इन्द्रियों के माध्यम से कुछ गलत करवा देता है। मन बुद्धि को नहीं जानता, पर बुद्धि मन को जानती है। बुद्धि मन की स्वामी है। बुद्धि मन को नियंत्रित-संयमित कर सकती है, दिशा दे सकती है।
हमारी जीवन यात्रा भी एक तरह का युद्ध ही है या यूँ कहें कि प्रत्येक का जीवन एक समुद्री यात्रा की तरह है, जो एक तरह का युद्ध ही है। जिस तरह समुद्री यात्रा में बहुत से खतरे होते हैं, उसी तरह हमारी जीवन यात्रा में बहुत से खतरे हैं। हमारी जीवन यात्रा तभी सुखद रह सकती है, जब मन रूपी नौका बुद्धि रूपी दिशा सूचक यंत्र के सहारे आगे बढ़े। जैसा कहा गया कि इस जीवन यात्रा में बहुत से खतरे है। इस यात्रा में मन को ही सबसे अधिक क्षति होती है, नुकसान होता है। मन की रक्षा करना प्रत्येक का उत्तरदायित्व है। संसार के वैभव किस काम के जब मन ही टूट जाए।
मन की इच्छाओं (desires of the mind) का सम्मान करना जीव (व्यष्टि आत्मा, जिसने शरीर धारण कर रखा है) का कर्तव्य है। अशांत मन से जीव की आत्मा निर्बल हो जाती है। (The soul of an organism becomes weak with a restless mind.) मन का अशांत होना बुद्धि की दिशा पर निर्भर है। दिशा सही तो दशा (परिणाम) सही।
मन के पाँच मुख्य दोष होते हैं - विषाद (sadness), क्रूरता (cruelty), व्यर्थ-चिंतन (waste-thinking), निरंकुशता (autocracy) और बुरे विचार (bad thoughts)। मन के इन दोषों का नाश विशुद्ध विचारों (pure thoughts) अर्थात् प्रसन्नता (happiness), सौम्यता (mildness), मानसिक मौन (mental silence), मनोनिग्रह और शुद्ध भावों (pure emotions) के परिशीलन (purification) से किया जा सकता है। दिन-रात संसार के अनुकूल-प्रतिकूल विषयों का चिंतन करते रहने से मन कभी शांत नहीं रह पाता है। इसके लिए बुद्धि का मन को अच्छी तरह समझकर संयमित और वश में करने की जरूरत है। मन आत्मा का स्वामीं नहीं, वरन सेवक है। यदि मन नियंत्रित होगा तो हमारे सभी शुभ कायों में यह हमारा सहायक बन जाएगा।
मन में इच्छा होती है। मन की इच्छा के कारण कर्मबन्धन है। मन रूपी नौका इस संसार के साधनों से चलती है, पर हमें अपना जीवन उन्नत करना है और मन को इसी संसार के पार ले जाना है। इसके लिए मन को लक्ष्य और परिस्थितियों के अनुसार संयमित करने की जरुरत है।
*साभार*
- श्रीमद्भगवद्गीता साधक संजीवनी - हिंदी-टीका, स्वामी रामसुखदास जी
- श्रीमद्भगवद्गीता यथारूप, स्वामी प्रभुपाद जी
- प्रवचन लेख, गुड़गांव निवासी श्रीकृष्ण भक्त 'दास कृष्ण' श्री कृष्ण गोपाल मिश्र जी
सादर,
केशव राम सिंघल
श्रीगीता-जयन्ती पर शुभकामनाएँ।



