अंतःकरण चतुष्टय और मैं
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चित्र साभार NightCafe
मैं सूक्ष्म रूप में 'अक्षर' (विनाशरहित) जीवात्मा हूँ, जो स्वयं 'अव्यय' परमात्मा का ही अंश है। जीवात्मा 'अक्षर पुरुष' है और परमात्मा 'पुरुषोत्तम' हैं, जो कभी नष्ट नहीं होते। जीवात्मा जब तक प्रकृति के गुणों से बंधी है, वह 'अक्षर' होकर भी 'क्षर' के खेल का हिस्सा बनी रहती है। मेरे चारों ओर व्याप्त यह दृश्यमान संसार 'क्षर' (परिवर्तनशील) माया का ही प्रसार है। यह शरीर (क्षेत्र) नाशवान है और केवल एक साधन मात्र है, जबकि इसमें स्थित मैं (क्षेत्रज्ञ) अविनाशी हूँ।
तात्विक रूप से आत्मा और जीवात्मा एक ही हैं, परंतु शरीर के बंधन में होने के कारण इसे जीवात्मा कहा जाता है। नाशवान शरीर में अपरा (परिवर्तनशील) प्रकृति के रूप में शरीर-मन-बुद्धि-अहंकार। नाशवान शरीर के भीतर 'अपरा प्रकृति' के रूप में मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार विद्यमान हैं। गीता (7.4) के अनुसार पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, मन, बुद्धि और अहंकार—ये आठ प्रकार की अपरा प्रकृति हैं। मन के दो रूप - इंद्रिय मन (बाह्य मन) और सर्वेंद्रिय मन (आंतरिक-संकल्प मन)। इन्द्रिय मन अर्थात् 'इन्द्रिय-अधिष्ठाता मन', जो इन्द्रियों को संचालित करता है। सर्वेन्द्रिय मन अर्थात् 'संकल्प-विकल्पात्मक मन' जो सोचता है। मन दोहरी भूमिका निभाता है—एक जो बाह्य इंद्रियों से सूचना ग्रहण करता है (इंद्रिय मन) और दूसरा जो आंतरिक अनुभवों का समन्वय करता है।
मेरे चारों ओर भरा पूरा संसार (माया) है, जिनके साथ मेरा आदान-प्रदान स्थूल मन-बुद्धि से होता है। माया इतनी प्रबल और सूक्ष्म है कि वह प्रखर बुद्धि को भी भ्रमित कर 'अहंकार' को ही सत्य सिद्ध कर देती है। अहंकार स्वयं को महत्व देता है। अहंकार को माया नहीं दिखती। अहंकार स्वयं माया का ही एक अंग है, इसलिए वह अपने स्रोत को नहीं पहचान पाता। माया अति सूक्ष्म बुद्धि को भ्रमित कर देती है।
मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार - ये हमारे भीतर के चार उपकरण 'अंतःकरण चतुष्टय' कहलाते हैं। जैसे बाहर के कार्यों के लिए हमारे पास हाथ-पैर हैं, वैसे ही आतंरिक अनुभव और ज्ञान के लिए चार मानसिक शक्तियाँ काम करती हैं। मन का काम है संकल्प और विकल्प करना। "यह करूँ या वह करूँ?" यह द्वंद्व मन का स्वभाव है। बुद्धि का काम है निर्णय लेना। "यही सही है" यह निश्चयात्मक शक्ति बुद्धि है। चित्त हमारी चेतना का वह कोश है, जहाँ संस्कार और स्मृतियाँ (Memories) संचित रहती हैं। अहंकार में "मैं" का भाव रहता है अर्थात कर्तापन का बोध कि "मैं यह कर रहा हूँ" या "मैं सही हूँ"।
प्रारब्ध कर्म जीवात्मा से जुड़े होते हैं, शरीर से नहीं। प्रारब्ध कर्मों का संचय जीवात्मा (कारण शरीर) के साथ होता है, न कि भौतिक शरीर के साथ। इसी कारण मृत्यु के पश्चात भी संस्कार जीवात्मा के साथ गमन करते हैं। मृत्यु केवल स्थूल शरीर की होती है, जबकि सूक्ष्म और कारण शरीर जीवात्मा के साथ अगले पड़ाव की यात्रा करते हैं।
आइए मन और चित्त के बीच मुख्य अंतर को समझें। मन और चित्त दोनों एक-दूसरे से गहरे जुड़े हैं, फिर भी सूक्ष्म स्तर पर इन दोनों में अंतर है। मन का मुख्य कार्य इन्द्रियों के माध्यम से आने वाली सूचनाओं पर प्रतिक्रिया करना है, जबकि चित्त भूतकाल के अनुभवों, कर्मों और संस्कारों का भण्डार गृह है। मन का स्वभाव अत्यंत चंचल है। यह क्षण-क्षण में बदलता रहता है, संकल्प-विकल्प में अटका रहता है। चित्त का स्वभाव गहरा और स्थिर होता है। इसमें दबी हुई इच्छाएँ और पुराने संस्कार बीज रूप में रहते हैं, जो समय आने पर याद आ जाते हैं। मन की भूमिका एक संग्रहकर्ता की तरह है, जो बाहर से विषय-वस्तु चुनता है। चित्त भण्डार-गृह है, जहाँ पुरानी फाइलें (यादें) सुरक्षित रहती हैं। मन की प्रक्रिया - जब कोई कुछ देखता है तो उसका मन कहता है - यह क्या है? चित्त उसी समय पुरानी स्मृति से मिलान कर बताता है कि यह तो मैंने पहले भी देखा था।
इसे हम एक उदाहरण से समझ सकते हैं। कल्पना कीजिए कि आप एक सुंदर दृश्य देख रहे हैं। आपका मन उस दृश्य को देखकर चकित होता है और विचार करता है कि यहाँ रुकूँ या आगे बढ़ूँ? (संकल्प-विकल्प)। उसी समय आपका चित्त उस दृश्य से जुड़ी आपकी पुरानी स्मृतियों को जाग्रत करता है। यदि आपने पहले कभी ऐसा दृश्य देखा था, तो उस समय का सुख या दुःख चित्त से ही उभर कर आएगा। आपकी बुद्धि यह निर्णय लेती है कि यह दृश्य वास्तव में सुंदर है या नहीं। क्या इसे देखा जाए या यहाँ से चला जाए? उसी समय आपका अहंकार यह अनुभव कर सोचता है कि "मैं" इस सुंदरता का आनंद ले रहा हूँ।
संक्षेप में 'मन' वह है जो अभी सक्रिय है और लहरों की तरह उठ रहा है, जबकि 'चित्त' वह गहरा सागर है जिसमें पूर्व जन्मों और इस जन्म के समस्त कर्म-संस्कार समाहित हैं।
सादर,
केशव राम सिंघल
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