गीता अध्ययन एक प्रयास
ॐ
जय श्रीकृष्ण
गीता अध्याय 9 - ज्ञान विज्ञान
9/16
अहं क्रतुरहं यज्ञः स्वधाहमहमौषधम्।
मन्त्रोअहमहमेवाज्यमहमग्निरहं हुतम्।।
9/17
पिताहमस्य जगतो माता धाता पितामहः।
वेद्यं पवित्रमोङ्कार ऋक्साम यजुरेव च।।
9/18
गतिर्भर्ता प्रभुः साक्षी निवासः शरणं सुहृत्।
प्रभवः प्रलयः स्थानं निधानं बीजमव्ययम्।।
9/19
तपाम्यहमहं वर्षं निगृह्णाम्युत्सृजामि च।
अमृतं चैव मृत्युश्च सदसच्चाहमर्जुन।।
भावार्थ
भगवान् श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं -
मैं वैदिक अनुष्ठान हूँ, मैं ही यज्ञ, तर्पण, औषधि, मन्त्र,
घी, अग्नि और हवन आहुति हूँ। मैं इस जगत (ब्रह्माण्ड)
का पिता, माता, पालनकर्ता, पितामह हूँ। मैं जान्ने योग्य पवित्र ओङ्कार हूँ। मैं ही
ऋग्वेद, सामवेद और यजुर्वेद हूँ। मैं लक्ष्य (गंतव्य), पालनकर्ता, ईश्वर, गवाह, निवास,
शरण, तुम्हारा प्रिय मित्र हूँ। मैं ही सृष्टि, प्रलय, स्थान, आश्रय और अविनाशी बीज
(कारण) हूँ। हे अर्जुन ! मैं ही सूर्य के रूप में तपता हूँ, मैं ही जल को ग्रहण करता
हूँ और फिर उसी जल को वर्षा रूप में बरसा देता हूँ। जीवन और मृत्यु तथा सत् और असत्
भी मैं ही हूँ।
प्रसंगवश
ये श्लोक भगवान की सर्वव्यापकता, सर्वशक्तिमत्ता और इस
सृष्टि के मूल कारण होने की महिमा को दर्शाते हैं। भगवान श्रीकृष्ण यहाँ अर्जुन को
समझाते हैं कि वे ही इस विश्व के प्रत्येक तत्व में विद्यमान हैं—चाहे
वह यज्ञ हो, मंत्र हो, अग्नि हो, या फिर यह संपूर्ण सृष्टि। वे न केवल सृष्टिकर्ता
हैं, बल्कि पालनकर्ता और संहारकर्ता भी हैं।
भगवान् ही इस संसार को बनाने वाले, चलाने वाले और उसे
लीन करने वाले हैं। वे ही सब कुछ हूँ। हम उनकी कृपा पर आश्रित हैं। जिस प्रकार बीज
से पुष्प उत्पन्न होता है, उसी प्रकार भगवान् अविनाशी बीज हैं, जिससे यह मायारुपी संसार
रचता है। वे अनादि हैं, ना जन्म लेने वाले और न ही समाप्त होने वाले। हमें समझना चाहिए
कि सभी कुछ भगवान् के कारण है। यह विचार हमें जीवन के परे उस शाश्वत सत्य की ओर ले
जाता है। भगवान् पदार्थ भी हैं और आत्मा भी हैं। सृष्टि से पहले भी भगवान् थे और सृष्टि
के समाप्त होने के बाद भी भगवान् ही रहेंगे।
सत् (परा प्रकृति) भी भगवान् स्वरूप है और असत् (अपरा प्रकृति) भी भगवान् का
ही स्वरूप है। शरीर असत् है और शरीर में बैठी आत्मा सत् है।
सत् = परा प्रकृति = अपरिवर्तनशील
असत् = अपरा प्रकृति = परिवर्तनशील
सादर,
केशव राम सिंघल